Thursday, May 31, 2012

ज्ञान की पृष्ठभूमि


ज्ञान की पृष्ठभूमि

प्रसन्न कुमार चौधरी



चार्ली चैप्लिन (मॉडर्न टाइम्स)
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मशीनीकरण, मुक्त समय और मार्क्स

अब हम मशीनीकरण के स्वाभाविक विकास-क्रम में उत्पन्न स्थितियों, औद्योगिक उत्पादन-प्रणाली पर उसके प्रभाव तथा नई अर्थव्यवस्था के साथ उसके आवयविक अन्तर्सम्बन्धों की चर्चा करेंगे । यहाँ हम मशीनीकरण की स्वाभाविक गति-प्रकृति के बारे में कार्ल मार्क्स के विश्लेषण से प्रस्थान करेंगे :
" पूंजी की उत्पादन प्रक्रिया में समाहित कर लिए जाने के बाद श्रम के उपकरण विभिन्न कायान्तरणों से गुजरते हैं जिनकी परिणति मशीन है, अथवा कहना चाहिए कि, मशीनरी की एक स्वचालित प्रणाली है । (स्वचालित मशीनरी मशीनरी प्रणाली का सबसे मुकम्मल, सबसे परिपूर्ण रूप है और एकमात्र वही मशीनरी को एक प्रणाली में रूपान्तरित करती है) .... अनेक यांत्रिक तथा बौद्धिक घटकों से युक्त इस स्वचालन में मजदूर महज उसकी सचेत कड़ियों के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं । .... मजदूर की कार्यवाही का, कार्यवाही के महज अमूर्तन के रूप में निपात घटित होता है । उसकी कार्यवाही चारो ओर से मशीनरी की गति द्वारा निर्धारित और नियंत्रित होती है । अपनी रचना के जरिए विज्ञान मशीनरी के निर्जीव पुर्जों को स्वचालन के रूप में लक्ष्योन्मुख क्रिया के लिए बाध्य करता है, लेकिन यह विज्ञान मजदूर की चेतना में अस्तित्वमान नहीं होता । वह तो एक पराई शक्ति के रूप में, खुद मशीन की शक्ति के रूप में मशीन के जरिए उसपर क्रिया करता है । .... उत्पादन प्रक्रिया अपनी नियामक एकता के रूप में श्रम की प्राबल्यवाली प्रक्रिया के अर्थ  में एक श्रम प्रक्रिया नहीं रह जाती । श्रम तो बस एक सचेत घटक के रूप में, मशीनरी प्रणाली के अनेक स्थलों पर व्यक्ति मजदूरों के बीच बिखरे रूप में उपस्थित होता है । ....श्रम की उत्पादक शक्ति में इजाफा और आवश्यक श्रम का अधिकतम संभव निषेध पूंजी की अनिवार्य प्रवृत्ति है, यह हम पहले देख चुके हैं । श्रमके उपकरणों का मशीनरीमें रूपान्तरण इसी प्रवृत्ति की उपलब्धि है । .... (मशीनरी, वैसे तो खुद संचित, मूर्त श्रम है, वस्तु रूप में मूल्य है, लेकिन वह खुद स्थिर पूंजी के रूप में मूल्य-सर्जक भूमिका में उपस्थित होती है, जिसकी तुलना में श्रमशक्ति की मूल्य-सर्जक शक्ति दिनोंदिन क्षीण होती जाती है ।) ज्ञान और कौशल के, सामाजिक मस्तिष्क की आम उत्पादक शक्तियों के संचय को, श्रम के विरुद्ध पूंजी में आत्मसात कर लिया जाता है, और वह पूंजी के, खास तौर पर स्थिर पूंजी के (जिस हद तक बतौर उत्पादन के साधन वह उत्पादन प्रक्रिया में शामिल होता है) गुण के रूप में उपस्थित होता है । इस प्रकार, मशीनरी स्थिर पूंजी के सबसे परिपूर्ण रूप में, और ....स्थिर पूंजी खुद पूंजी के सबसे परिपूर्ण रूप में सामने आती है । .... इसके अलावा, जहाँ तक मशीनरी समाज के विज्ञान के, सामान्यतः उत्पादक शक्ति के संचय के साथ विकसित होती है, आम सामाजिक श्रम खुद को श्रम में नहीं, बल्कि पूंजी में प्रस्तुत करता है । 

कार्ल मार्क्स (1818-1883)
मशीनरी आम तौर पर श्रम के औजार के रूप में, एक भौतिक वस्तु के रूप में अपना प्रत्यक्ष रूप खो देती है । वह स्थिर पूंजी हो जाती है और भौतिक रूप से पूंजी के रूप में मजदूर के आमने-सामने होती है । मशीनरी में, ज्ञान मजदूर के समक्ष एक बाहरी, पराई चीज के रूप में और सजीव श्रम आत्म-क्रियाशील मूर्त श्रम के अधीनस्थ के रूप में उपस्थित होता है । जिस हद तक उसका कार्य (पूंजी की) जरूरतों द्वारा निर्धारित नहीं होता, मजदूर उस हद तक फालतू प्रतीत होता है । .... पूरी उत्पादन प्रक्रिया मजदूर के प्रत्यक्ष कौशल के अधीन संपन्न होती नहीं दिखती, बल्कि विज्ञान के तकनालॉजिकल प्रयोग के रूप में उपस्थित होती है । इस प्रकार, उत्पादन को एक वैज्ञानिक चरित्र प्रदान करना पूंजी की प्रवृत्ति है ; प्रत्यक्ष श्रम इस प्रक्रिया में महज एक क्षण के रूप में परिणत हो जाता है । .... (मजदूर का श्रम परिचालित पूंजी के बस एक गुण के रूप में सामने आता है और परिचालित पूंजी के रूप में पूंजी विभिन्न मजदूरों के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश आती है ।) ऐतिहासिक रूप से मशीनरी का प्रयोग खुद फालतू हाथों की पूर्वापेक्षा करता है । मशीन का प्रवेश (श्रम को विस्थापित करने के लिए) खुद नहीं होता है, जहाँ श्रमशक्ति की आपूर्ति जरूरत से ज्यादा हो । वह, जैसा कि अर्थशास्त्रीगण कल्पना करते हैं, श्रमशक्ति के अभाव की स्थिति में, श्रमिक की सहायता के लिए नहीं आता । पूंजी के अनुपात में जहाँ श्रमशक्ति का संकेन्द्रण जरूरत से ज्यादा होता है, मशीनरी वहीं स्थापित की जाती है, ताकि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध श्रमशक्ति को अपनी जरूरी मात्रा तक ही सीमित रखा जाए । .... 
मशीनरी में, पूंजी द्वारा सजीव श्रम का आत्मसातीकरण एक प्रत्यक्ष यथार्थ की शक्ल ले लेता है । अव्वल तो सीधे विज्ञान से हासिल यांत्रिक और रासायनिक नियमोंका विश्लेषण और प्रयोग मशीन को वह काम करनेमें सक्षम बनाता है जो पहले मजदूरों द्वारा किया जाता था । बहरहाल, इस राह पर मशीनरी का विकास सिर्फ तब ही घटित होता है जब बड़े उद्योग अपने विकास की उच्चतर अवस्था में पहुँच चुके होते हैं, और सारा विज्ञान पूंजी की सेवा में हाजिर हो चुका होता है । दूसरे, जब उपलब्ध मशीनरी खुद पहले से ही विराट क्षमताएँ प्रदान करती होती है । तब अनुसंधान एक व्यवसाय बन जाता है । और प्रत्यक्ष उत्पादन में विज्ञान का प्रयोग खुद एक निर्धारक एवं अपेक्षित संभावना बन जाता है ।
लेकिन यह वह राह नहीं है जिस पर चलकर मशीनरी का कमोबेश उद्भव हुआ – वह राह तो और भी नहीं जिस पर चलकर आगे उसका और विस्तार हो रहा है । वह राह तो विभाजन की है – श्रमविभाजन के जरिए मजदूरों के कार्य क्रमशः यांत्रिक क्रियाओं में अधिकाधिक रूपान्तरित होने लगे और एक खास बिन्दु पर जाकर मशीनरी द्वारा उनकी जगह लेना संभव हो गया । इस प्रकार, कार्य की यह विशिष्ट प्रणाली यहाँ प्रत्यक्षतः मशीन की शक्ल में मजदूर से पूंजी में बदल जाने के रूप में प्रकट होती है, और इसप्रकार खुद उसकी श्रमशक्ति का अवमूल्यन घटित होता है । इसीलिए मशीनरीके खिलाफ मजदूरोंका संघर्ष जन्म लेता है । मजदूर की सजीव सक्रियता मशीन की सक्रियता बन जाती है । इसप्रकार पूंजी द्वारा श्रम का आत्मसातीकरण मजदूर के समक्ष एक भोंडे कामुक रूप में अवतरित होता है ; पूंजी श्रम को अपने आप में समा लेती है – मानो उसका शरीर प्रेम के वशीभूत हो गया हो (गेएठे; ‘फॉस्ट’, पार्ट 1, एक्ट 5)

रोबोटिक असेम्बली लाइन
मूर्त श्रम के लिए सजीव श्रम का विनिमय – अर्थात पूंजी और श्रमशक्ति के अन्तर्विरोध के रूप में सामाजिक श्रम की प्रस्तुति – मूल्य-सम्बन्ध और मूल्य पर आधारित उत्पादन का चरम विकास है । इसका आधार है सम्पत्ति के उत्पादन में निर्धारक कारक के रूप में नियोजित श्रम की मात्रा, प्रत्यक्ष श्रमकाल की अवधि । लेकिन बड़े उद्योग के विकास की एक सीमा के बाद, वास्तविक सम्पत्ति का निर्माण नियोजित श्रम की मात्रा और श्रमकाल पर कम-से-कम निर्भर होता जाता है । वह तो अधिकाधिक श्रमकाल के दौरान क्रियाशील की गई एजोन्सियों की शक्ति पर निर्भर होता जाता है । उन एजेन्सियों (मशीनरी) की शक्तिशाली क्षमता भी अपने उत्पादन पर लगे प्रत्यक्ष श्रमकाल की तुलना में विज्ञान की आम स्थिति, तकनालॉजी की प्रगति अथवा उत्पादन में इस विज्ञान के प्रयोग पर अधिकाधिक निर्भर होती जाती है । .... श्रम अब उत्पादन प्रक्रिया के अन्दर भागीदार के रूप में उतना उपस्थित नहीं दिखता – मनुष्य की भूमिका चौकीदार के रूपमें या उत्पादन-प्रक्रिया के नियंत्रक के रूपमें अधिक नजर आती है । ..पराये श्रमकाल की चोरी, जिसपर मौजूदा सम्पत्ति आधारित है, खुद बड़े उद्योग द्वारा सृजित इस नयी सम्पत्ति के समक्ष दयनीय आधार साबित होती है । जैसे ही प्रत्यक्ष रूप में श्रम सम्पत्ति का विराट स्रोत नहीं रह जाता, श्रमकाल उसका मापदण्ड भी नहीं रह पाता है और न ही उसे रहना चाहिए । उसी तरह उपयोग मूल्य के मापदण्ड के रूप में विनिमय मूल्य की भूमिका भी समाप्त हो जानी चाहिए । जनसमुदाय का अतिरिक्त श्रम सामान्य सम्पत्ति के विकास की शर्त नहीं रह जाता, और उसी तरह कुछ लोगों का श्रम से मुक्त रहना मानव मस्तिष्क की आम शक्तियों के विकास के लिए जरूरी नहीं रह जाता । इसके साथ ही विनिमय मूल्य पर आधारित उत्पादन भी विघटित हो जाता है । ....
समाज के आवश्यक श्रम में न्यूनतम हद तक गिरावट और उसी के अनुरूप मुक्त हुए समय में, और निर्मित साधनों के साथ, (सभी के लिए) व्यक्ति का कलात्मक, वैज्ञानिक, आदि विकास .... पूंजी खुद एक गतिशील अन्तरविरोध है, इस अर्थ में कि एक ओर तो वह श्रमकाल को न्यूनतम हद तक कम करने का दबाव बनाती है, और दूसरी ओर उसी श्रमकाल को सम्पत्ति के एकमात्र मापदण्ड और स्रोत के रूप में प्रस्तुत करती है । इसीलिए वह आवश्यक रूप से श्रमकाल को कम करती जाती है ताकि फाजिल रूप में उसकी वृद्धि हो ; बढ़ता हुआ फाजिल काल आवश्यक श्रमकाल के लिए – जीवन-मरण का प्रश्न – एक शर्त बन जाता है । एक ओर वह विज्ञान तथा प्रकृति की सारी शक्तियों का, सामाजिक संयोजन तथा सामाजिक सह-क्रिया का आवाहन करती है ताकि सम्पत्ति का सृजन (सापेक्ष रूप से) उस पर व्यतीत श्रमकाल से स्वतंत्र हो जाये । दूसरी ओर, वह इस प्रकार सृजित विराट सामाजिक शक्तियों के मापदण्ड के रूप में श्रमकाल का प्रयोग करना चाहती है और पहले ही सृजित मूल्य को मूल्य के रूप में बरकरार रखने के लिए जरूरी सीमाओं के भीतर ही उन सामाजिक शक्तियों को कैद रखना चाहती है । उत्पादन की शक्तियाँ और सामाजिक सम्बन्ध – सामाजिक व्यक्ति के विकास के दो भिन्न पक्ष – पूंजी के समक्ष महज साधन के रूप में अवतरित होते हैं और वे सीमित आधार पर उत्पादन के लिए पूंजी के महज साधन ही हैं । बहरहाल, वे इस आधार को दरअसल आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाने की भौतिक स्थितियाँ हैं । सच्चा समृद्ध राष्ट्र वही है, जहाँ कार्यदिवस बारह घण्टे की जगह छः घण्टे है । सम्पत्ति अतिरिक्त श्रमकाल पर कमान हासिल करना नहीं है । (वास्तविक सम्पत्ति तो) फाजिल समय पर, प्रत्येक व्यक्ति और समूचे समाज के लिए, प्रत्यक्ष उत्पादन में आवश्यक समय के बाहर फाजिल समय पर नियंत्रित करना है । ....

कम्प्यूटर डिसप्ले प्रोडक्शन लाइन
प्रकृति कोई मशीन नहीं बनाती, न इंजन, न रेलगाड़ी, न विद्युत टेलीग्राफ, न स्वचालित यंत्र, आदि । वे मानवीय उद्यम के उत्पाद हैं ; वे प्रकृति के ऊपर मानवीय इच्छा शक्ति के, अथवा प्रकृति में मानवीय भागीदारी के अंग के रूप में रूपान्तरित प्राकृतिक संसाधन हैं । वे मानवीय हाथों द्वारा सृजित मानव मस्तिष्क के साधन हैं । ज्ञान की शक्ति, मूर्तिमान । स्थिर पूंजी का विकास इस बात का सूचक है कि आम सामाजिक ज्ञान किस मात्रा में प्रत्यक्ष उत्पादन शक्ति बन गया है । और इसीलिए, सामाजिक जीवन प्रक्रिया की स्थितियाँ खुद किस हद तक आम बुद्धि के नियंत्रण में आ चुकी है और उसके अनुरूप ढ़ल चुकी है । ....
आम तौर पर समाज के लिए और समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक श्रमकाल से अलग फाजिल समय का बड़ी मात्रा में सृजन (दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की, और इसीलिए समाज की उत्पादक शक्तियों के पूर्ण विकास के लिए अवसर का सृजन) – पूंजी के (विकास के) चरण में ऐसे फाजिल समय का सृजन, जो श्रमकाल नहीं है, सामने आता है । (पूंजी-पूर्व के) सभी समाजों में भी यह फाजिल (खाली) समय (जो श्रमकाल नहीं है) दिखाई देता है, लेकिन तब वह कुछ लोगों को ही उपलब्ध हुआ करता था । पूंजी ने इसमें जो योगदान किया है, वह है कला और विज्ञान के समस्त साधनों के द्वारा जनसमुदाय के अतिरिक्त श्रमकाल में वृद्धि, क्योंकि इसकी सम्पत्ति अतिरिक्त श्रमकाल के प्रत्यक्ष अपहरण में निहित है – उपयोग मूल्य नहीं, बल्कि (विनिमय) मूल्य हासिल करना ही इसका प्रत्यक्ष प्रयोजन है । इसप्रकार, (और इसके बावजूद), इसने सामाजिक रूप से फाजिल समय के साधनों के निर्माण में सहायक की भूमिका अदा की है, ताकि पूरे समाज के लिए श्रमकाल को न्यूनतम हद तक कम किया जा सके, और इसप्रकार अपने विकास के लिए सभी को मुक्त समय उपलब्ध हो सके । लेकिन इसकी प्रवृत्ति हमेशा, एक ओर, फाजिल समय का सृजन करने, तथा दूसरी ओर, इसे अतिरिक्त समय में बदलने की रही है । यदि वह पहले कार्य में बहुत ज्यादा सफलता हासिल करती है तो वह अतिउत्पादन का शिकार हो जाती है और तब आवश्यक श्रम भी बाधित हो जाता है, क्योंकि पूंजी कोई अतिरिक्त श्रम हासिल नहीं कर पाती । यह अन्तरविरोध जितना ही बढ़ता जाता है, उतना ही ज्यादा यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्पादक शक्तियों का विकास अब पराये श्रम के अपहरण के साथ बँधा नहीं रह सकता, कि मजदूरों को खुद ही अपने अतिरिक्त श्रम को अपने अधिकार में ले लेना होगा । एक बार यदि वे ऐसा कर लेते हैं तो फाजिल समय का विरोधमूलक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । तब, एक ओर, आवश्यक श्रमकाल सामाजिक व्यक्ति की आवश्यकताओं द्वारा मापा जाएगा, और दूसरी ओर, सामाजिक उत्पादन की शक्ति का विकास इतनी तेजी से होगा कि, यद्यपि अब सभी की सम्पत्ति के लिए उत्पादन की गणना होगी, तथापि सभी के लिए फाजिल समय में वृद्धि होगी, क्योंकि वास्तविक सम्पत्ति सभी व्यक्तियों की विकसित उत्पादक शक्ति है । सम्पत्ति का मापदण्ड तब किसीभी रूपमें श्रमकाल नहीं रह जाएगा, बल्कि प्रयोज्य काल हो जाएगा । .... अगर किसी देश का सम्पूर्ण श्रम पूरी आबादी के निर्वाह मात्र पर ही खर्च हो जाता है, तो अतिरिक्त श्रम जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं होगा, और परिणामस्वरूप ऐसी कुछ चीज भी नहीं रहेगी, जिसे पूंजी के रूप में संचित किया जा सके । यदि एक साल में लोग दो साल के निर्वाह के लायक उत्पादन कर लेते हैं, तो एक साल लोग उत्पादक श्रम स्थगित कर सकते हैं । लेकिन अतिरिक्त उत्पाद अथवा पूंजी के स्वामी ....लोगों को कुछ ऐसे काम में नियोजित कर देते हैं जो प्रत्यक्षतः और तात्कालिक रूप से उत्पादक नहीं है, जैसे मशीनरी की स्थापना । इस तरह यह प्रक्रिया चलती रहती है । ....
श्रमकाल की बचत खाली समय, यानी व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए समय, की वृद्धि के बराबर है । ....प्रत्यक्ष उत्पादन-प्रक्रिया की स्थिति से इसे स्थिर पूंजी के उत्पादन के रूप में देखा जा सकता है, यहाँ स्थिर पूंजी खुद मनुष्य है । बहरहाल, कहने की जरूरत नहीं कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के परिप्रेक्ष्य से जिस रूप में यह उपस्थित होता है, उस रूप में प्रत्यक्ष श्रमकाल खुद खाली समय के निरपेक्ष विरोध में बरकरार नहीं रह सकता । .... खाली समय – जो एक ही साथ फालतू समय और उच्चतर कार्यों के लिए समय भी है – अपने स्वामी को स्वभावतः एक भिन्न व्यक्ति में बदल देता है, और वह तब इस भिन्न व्यक्ति के रूप में प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया में शामिल होता है । 

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बुर्जुआ अर्थव्यवस्था की प्रणाली हमारे लिए जैसे क्रमिक रूप से विकसित हुई है, उसी तरह उसका निषेध भी, जो उसकी अन्तिम परिणति है । हमारा वास्ता अब भी प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया से है । जब हम बुर्जुआ समाज को एक लम्बे फलक पर और सम्पूर्णता में देखते हैं तो सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया का अन्तिम परिणाम हमेशा खुद समाज के रूप में उपस्थित होता है । स्थिर रूपवाला सबकुछ, जैसे उत्पाद, आदि महज एक क्षण के रूप में, इस गति की प्रक्रिया के विलुप्त होते क्षण के रूप में उपस्थित होता है । प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया खुद महज एक क्षण के रूप में अवतरित होती है । इस प्रक्रिया की स्थितियाँ और वस्तु-रूपों में उसके रूपान्तरण, समान रूप से, उसके क्षण ही हैं । व्यक्ति, (लेकिन) पारस्परिक सम्बन्धों में बँधे व्यक्ति ही इसके एकमात्र विषय हैं – इन सम्बन्धों को भी वे उसी तरह पुनरुत्पादित और नये सिरे से उत्पादित करते रहते हैं । यह उनकी अपनी गति की सतत् प्रक्रिया है, जिसमें वे खुद अपने द्वारा सृजित सम्पत्ति की दुनिया का पुनर्नवीकरण करते हुए अपना पुनर्नवीकरण भी करते रहते हैं । .... "

मार्क्स की ग्रुंड्रिसे   (फरवरी 1858 से जून 1858 के आरम्भ के बीच लिखी गई नोटबुक VI और VII) के कुछ अंशों के लम्बे उद्धरण का अभिप्राय यह दिखलाना था कि किस तरह औद्योगिक उत्पादन-प्रणाली के विकास, मशीनीकरण ने, खुद ऐसी वस्तुगत स्थितियाँ उत्पन्न कीं जिनपर आधारित होकर एक नई अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है । [ हम पहले देख चुके हैं कि किस प्रकार यह नई अर्थव्यवस्था औद्योगिक-वित्तीय पूंजी के साथ जुड़कर आगे बढ़ी । पूंजी के परिचीलन की प्रक्रिया में सूचना-उत्पादों के रूप में ज्ञान का निवेश मशीनीकरण (स्थिर पूंजी) के साथ जुड़कर अतिरिक्त मूल्य के विस्तार का नया स्रोत बन गया, और इस प्रकार अतिरिक्त मूल्य के स्रोत के रूप में श्रमशक्ति की भूमिका का और अवमूल्यन घटित हुआ । लेकिन शीघ्र ही यह ज्ञान-उद्योग औद्योगिक-वित्तीय पूंजी से स्वतंत्र हो गया और उसने मुक्त समय तथा ज्ञान-उत्पादों के पारस्परिक विनिमय पर आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में काफी तेजी से विस्तार लाभ किया ] ………………….
( ग्रुंड्रिसे से उद्धृत अंशों का हिन्दी रूपान्तर लेखक द्वारा । )

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Tuesday, May 29, 2012

ज्ञान का संज्ञान - 2


ज्ञान का संज्ञान – 2

प्रसन्न कुमार चौधरी










इस युग को क्या नाम दें

आज के युग की (पहले वर्णित) विशेषताओं के साथ-साथ कुछ और पहलुओं की चर्चा यहाँ अपेक्षित है । अर्थव्यवस्था की नयी शाखाओं और नयी वृत्तियों से जुड़े लोगों – जिन्हें ज्ञान श्रमिक (नॉलेज वर्कर) कहा जाता है, की श्रेणी निरन्तर बढ़ती जा रही है । सेवा क्षेत्र के अलावा, औद्योगिक तथा व्यावसायिक निगमों में ज्ञान श्रमिकों का अनुपात काफी बढ़ा है । वित्त, मीडिया तथा दवा उद्योग में तो मैकेन्जी के एक अनुमान के अनुसार, 2007 में ही ऐसे कर्मचारी कुल कर्मचारियों के पच्चीस फीसदी का निर्माण करते थे । फैक्टरियों में संगठित औद्योगिक श्रमिकों की तुलना में इन ज्ञान श्रमिकों की कार्यस्थितियाँ, उनका संगठन काफी भिन्न है । प्रबन्धन गुरू पीटर ड्रकर ने 1969 में ही लिखा था, पिछली (19वीं) सदी में जिस तरह प्रबन्धन का महत् कार्य शारीरिक श्रम को उत्पादक बनाना था, उसी तरह ज्ञान श्रम को उत्पादक बनाना प्रबन्धन के लिए इस शताब्दी (20वीं सदी) का महत् कार्य है । उनका संकेत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में बैथलहम आइरन कम्पनी के लिए काम करते हुए एक अमेरिकन क्वेकर फ्रेडरिक विंसलो टेलर द्वारा विकसित की गई पीस रेट पद्धति की ओर था जिससे (शिक्षा तथा कौशल से वंचित) शारीरिक श्रम करनेवाले औद्योगिक श्रमिकों की उत्पादकता में काफी वृद्धि हुई थी ।
कम्प्यूटरों पर आधारित नये उपकरणों और इन्हें संचालित करनेवाले ज्ञान श्रमिकों ने कृषि-उद्योग-सेवा सभी क्षेत्रों में उत्पादकता में भारी वृद्धि की है तथा विकासशील समाजों के पूंजीवादी रूपान्तरण और वैश्विक बाजार के विस्तार को गति प्रदान की है । इसने वित्त-बीमा-रीयल इस्टेट क्षेत्र को भी विश्वव्यापी पैमाने पर तथा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्तरों पर अपना संजाल फैलाने की अभूतपूर्व क्षमता प्रदान की है । बाजार के विश्वव्यापी विस्तार को इसने न सिर्फ जबर्दस्त आवेग दिया,बल्कि उसे नई ऊँचाई और गहराई भी दी है। (यहाँ विश्लेषण में न जाते हुए भी बता दें कि अमेरिका तथा यूरोप की आर्थिक मंदी और वित्तीय संकट की एक वजह यह भी रही है ।)
कृषि से औद्योगिक समाज में संक्रमणकाल में जिसतरह भूदासों-गरीब किसानों को औद्योगिक श्रमिक बनने पर ऐसा लगता था कि उनकी मजदूरी सामन्तों द्वारा दी जानेवाली मजूरी से काफी ज्यादा है और यह कि बारह घंटे काम करने के बाद वे अब आजाद हैं (हालांकि उनकी उत्पादकता की तुलना में उनकी मजदूरी तुच्छ ही थी) ; उसी तरह ज्ञान श्रमिकों को लगता है कि सालाना लाखों रुपये का उनका पैकेज औद्योगिक मजदूरों की तुलना में काफी ज्यादा है, और साथ ही कार्यस्थितियाँ भी काफी बेहतर हैं । अनेक मामलों में तो काम भी घर बैठे कम्प्यूटर पर ही किया जा सकता है । कम्प्यूटर और प्लास्टिक मनी के आगमनके साथ कार्यालयों का पुराना स्वरूप तथा कागजी काम अब पूरीतरह बदल चुका है ।

लार्ज हेड्रन कोलाइडर
बहरहाल, इन ज्ञान श्रमिकों की उत्पादकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ज्ञान-उद्योगों के स्वामी अपेक्षाकृत संक्षिप्त काल में ही अरबपति हो जाते हैं । अपने स्वामियों की सम्पत्ति में होनेवाले इजाफे के परिप्रेक्ष्य में देखने के बजाए ज्ञान श्रमिक प्रायः औद्योगिक श्रमिकों के वेतन से अपनी आमदनी की तुलना करते हैं । जहाँ तक कार्यस्थिति की बात है, इन ज्ञान श्रमिकों का श्रमकाल कई संस्थाओं में आठ घण्टे से भी अधिक है, प्रशिक्षण-सेमिनार-कौशल-उन्नयन-जन्य कार्यशालाओं आदि के जरिए उनके अवकाश भी छिन जाते हैं और प्रबंधन की कोशिश होती है कि कैसे कर्मचारियों की पूरी दिनचर्या अपने काम के इर्द-गिर्द घूमती रहे – आधुनिक उपकरणों ने इसके लिए साधन भी जुटा दिया है । इस तरह के श्रमिक चौबीसो घंटे अपने प्रबंधकों की, बिग बॉस की नजरों में रहते हैं । संगठन, विरोध, आदि की गुंजाइश न के बराबर रहती है और रोजगार की सुरक्षा हमेशा खतरे में । कम्प्यूटर पर लम्बे समय तक बैठकर काम करना नई-नई शारीरिक तथा मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहा है और इन विशिष्ट पेशा-आधारित बीमारियों के इलाज के लिए काउन्सिलिंग अथवा थेरापी-केन्द्र भी खुल रहे हैं ।
अरबों डॉलर के स्वामी बिल गेट्स के एक तिहाई ज्ञान श्रमिक अस्थाई कर्मचारी हैं । मनीला (फिलीपींस) के उपनगरीय इलाकों में बेहद कम वेतन और दयनीय कार्यस्थितियों में आई बी एम के लिए सीडी-रोम ड्राइव बनानेवाले किशोर-किशोरियाँ खुद कम्प्यूटर शिक्षा से वंचित हैं । स्टीव जोब्स के आइफोन्स की मैन्युफैक्चरिंग इकाई शेनझेन (चीन) में है जहाँ 2010 में तीन महीनों के अन्दर 9 कर्मचारियों ने आत्महत्या कर ली थी । उनके कर्मचारियों के पास किसी दूसरे की जिन्दगी जीने के अलावा कोई और अवसर नहीं है ।

इन नये उपकरणों के आने के बाद पहले से चले आ रहे औद्योगिक समूहों को भी अपने-आपको बदलना पड़ा है । जो बदले और इस नयी प्रणाली से ठीक से जुड़े, वे तेजी से फले-फूले, और जो इससे अलग रहे, वे पिछड़ गए या फिर उन्हें बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा । विप्रो की पहचान उसकी उपभोक्ता सामग्रियों से नहीं, बल्कि बी पी ओ क्षेत्र से है । टाटा समूह की पहचान अब सिर्फ टाटा स्टील नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक टी सी एस (टाटा कसल्टेंसी सर्विसेज) है ।
इस नये आर्थिक क्षेत्र के विकास में वेन्चॅ पूंजी (venture capital) की उत्प्रेरक की भूमिका रही है । अमेरिका में पहली वेन्चॅ पूंजी संस्था अमेरिकन रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट थी जिसने 1957 में डिजिटल इक्विपमेण्ट नामक उद्यम के लिए पूंजी जुटाई थी । बाद के दशकों में वेन्चॅ पूंजी का विस्तार हुआ और 90 के दशक के बाद उसमें भारी वृद्धि हुई । (प्रसंगवश, भारत में कुछ बड़ी देशी-विदेशी वेन्चॅ पूंजी कम्पनियाँ और संस्थाएँ इस प्रकार हैं – वारवर्ग पिनकस, आइसीआइसीआइ वेन्चॅ, रिलायन्स टेक्नोलॉजी वेन्चॅस लि., यू टी आइ वेन्चॅ फण्ड, जनरल अटलांटिक पार्टनर्स, टेमासेक होल्डिंग्स, न्यूब्रिज कैपिटल, क्रिस कैपिटल, मर्लियोन इंडिया, सी डी सी, दि स्मॉल फार्मर्स एग्री-बिजनेस कांसोर्टियम, एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाउण्डेशन, आदि । जिन क्षेत्रों में वे पूंजी उपलब्ध कराती हैं, उनमें प्रमुख हैं – सूचना-संचार, बायोटेक, बीपीओ, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, ऊर्जा, फार्मा, अधिसंरचनात्मक ढांचा, सॉफ्टवेयर, खुदरा व्यवसाय, आदि । भारत में वेन्चॅ पूंजी निवेश 2003 में करीब 59 करोड़ डॉलर था जो 2005 में बढ़कर 1.4 अरब डॉलर हो गया था ।)
नयी अर्थव्यवस्था अनवरत् अन्वेषण, आविष्कार और नवाचार पर आधारित है – एक उपकरण, एक प्रविधि, एक विचार के बाजार में आते ही उससे उन्नत दूसरा उपकरण, दूसरी प्रविधि, दूसरा विचार उसके पीछे आ खड़ा होता है । इस तरह दो उपकरणों और प्रविधियों के बीच का अन्तराल लगभग शून्य की ओर प्रवृत्त होता है – सृजनात्मक विध्वंस की प्रक्रिया अनवरत् चलती रहती है । उपकरणों की उपयोगिता सामान्यतः समाप्त हो जाती है और उनकी पुनः बिक्री अपना महत्व खो देती है । इन पुराने उपकरणों के कचरों को ठिकाने लगाना आज एक विश्वव्यापी समस्या है । इस आविष्कार तथा नवाचार में पहल लेनेवाली कम्पनियों को शुरुआती महीनों में एकाधिकार मुनाफा अथवा शुल्क प्राप्त होता है । ऐसे नये उपकरण, जाहिर है, शुरू-शुरू में क्लास के उपकरण होते हैं । क्लास से मास उपकरण बनने की प्रक्रिया में उपभोक्ता आधार बढ़ने से कीमतों में कमी आती है । वैसे प्रबंधन गुरू सी के प्रह्लाद की फॉरच्यून एट दि बॉटम ऑफ द पिरामिड की अवधारणा को कार्यरूप देते हुए अब नये उपकरणों का सस्ता संस्करण भी जारी किया जाता है । शैम्पू के एक रुपये के सैशे की तरह मुफ्त सिम और दस रुपये के रीचार्ज कूपन ने मोबाइल ग्राहकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की । सस्ते मोबाइल सेट का भी अपना बड़ा बाजार है ।

चीन में एपल की मैन्युफैक्चरिंग इकाई
इस नयी अर्थव्यवस्था ने आर्थिक विषमता में बेतहाशा वृद्धि को अंजाम दिया है । इससे जुड़ी कम्पनियों के कुछ मालिकों की सम्पत्ति अनेक देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है । इस अर्थव्यवस्था के विस्तार की तुलना में रोजगार में वृद्धि की रफ्तार काफी धीमी रही है। इसीलिए इसे रोजगारविहीन संवृद्धि की संज्ञा दी जाती है। (कृषि से उद्योग में संक्रमण के दौरान उद्योगों में रोजगार ने रफ्तार पकड़ी थी और कालक्रम में प्रत्येक औद्योगिक देश में कृषि पर निर्भर आबादी में तेजी से ह्रास हुआ और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र सबसे बड़ा रोजगारदाता बन गया । वैसे, यह प्रक्रिया उन देशों में शताब्दियों अथवा दशाब्दियों में संपन्न हुई ।) कुलमिलाकर, देश के अन्दर और विश्वव्यापी पैमाने पर आर्थिक विषमता की खाई और चौड़ी हुई है । अतिरिक्त सम्पत्ति के वितरण में लगान, मुनाफा, ब्याज के साथ-साथ सेवा-शुल्कों ने एक महत्वपूर्ण घटक का स्थान ग्रहण कर लिया है ।
ये उपकरण चूंकि सूक्ष्म कणों पर आधारित हैं, इसीलिए इन कणों की खोज और उनके अध्ययन अत्यन्त उच्च स्तर के वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रों की मांग करते हैं । इनमें काफी पूंजी-निवेश की भी जरूरत होती है । पार्टिकल एक्सलेटर्स की संख्या काफी कम है और वे कुछ विकसित देशों में (मुख्यतः अमेरिका और यूरोप में) ही केन्द्रित हैं (न्यूट्रिनॉस के अध्ययन पर केन्द्रित एक संस्थान जापान में है) । इन उपकरणों का मैन्युफैक्चरिंग हब मुख्यतः चीन है, जबकि सॉफ्टवेयर के विकास के मुख्य क्रियास्थल भारत, आयरलैंड, फिलीपींस (और अब वियतनाम) जैसे देश हैं । इसी तरह आनुवंशिकी, बायोटेक, नैनोतकनीक, आदि के क्षेत्रों में भी उन्नत स्तर की प्रयोगशालाएँ विकसित देशों में ही केन्द्रित हैं और वही देश इन अनुसंधानों में अग्रणी हैं । वैसे अन्तरिक्ष तकनीक समेत इन सारे क्षेत्रों में चीन तेजी से उन देशों के काफी करीब पहुँच रहा है । वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े शोध पत्रों के प्रकाशन में अमेरिका और चीन के बीच का अन्तराल पिछले दशक में काफी कम हुआ है । 1996 में अमेरिका के 2,92,513 शोध पत्रों की तुलना में चीन में मात्र 25,474 शोध पत्र प्रकाशित हुए थे । बारह साल बाद, 2008 में अमेरिका में प्रकाशित शोध पत्रों की संख्या 3,16,317 थी, लेकिन 1,84,080 शोध पत्रों के साथ चीन भी काफी पीछे नहीं रह गया था ।
अनवरत् अन्वेषण, आविष्कार और नवाचार पर आधारित होने के कारण इस नई अर्थव्यवस्था ने विचार और व्यवहार के क्षेत्र में रूढ़ियों को तोड़ने, अनजान क्षेत्रों में कदम बढ़ाने का साहस करने, लीक से हटकर सोचने तथा काम करने का जोखिम उठाने की उद्यमी भावना को आवेग प्रदान किया है । इन नये उपकरणों से जुड़े सारे आरंभिक उद्यमी अमूमन सामान्य पृष्ठभूमि से आनेवाले ऐसे ही लीक से हटकर सोचने और काम करनेवाले, प्रचलित से हटकर नया कुछ करने ऐर इस प्रक्रिया में जोखिम उठानेवाले लोग ही थे (समाज की नजरों में कुछ अवारा किस्म के लोग) । उनमें से कुछ ने तो अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छोड़ दी थी । यहाँ उदाहरण देने के बजाए, स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में एपल के संस्थापक स्टीव जोब्स के व्याख्यान की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना ही पर्याप्त होगा । उन्होंने भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और स्टीव वोजनिएक के साथ मिलकर जब उन्होंने एपल की स्थापना की, तब उनकी उम्र मात्र बीस साल थी : “तुम्हारा समय सीमित है, इसलिए किसी दूसरे की जिन्दगी जीने में इसे बरबाद मत करना । किसी जड़सूत्र के जाल में मत फँसना – इसका मतलब है, दूसरे लोगों के चिन्तन के परिणामों के साथ मत जीना । दूसरे लोगों के मतों के शोर में अपनी खुद की पुकार को गुम मत होने देना । ..(ज्ञान के लिए) हमेशा भूखा रहना, हमेशा मूर्ख बने रहना । ..महान कार्य करने का बस एक ही रास्ता है अपने काम से प्यार करना । अगर तुम्हें वह अबतक प्राप्त नहीं हुआ है, तो खोज जारी रखो । स्थिर मत बैठना ..साल भर पहले मुझे अपने कैंसर के बारे में पता चला । ......इससे गुजरने के बाद, मैं अब तुम लोगों से कह सकता हूँ :  तुम्हारा समय सीमित है, किसी दूसरे की जिन्दगी जीने में इसे बरबाद मत करना । (बहरहाल, हम पहले दिखा चुके हैं कि कैसे एपल के कर्मचारी दूसरे लोगों के चिन्तन के परिणामों के साथ जीने को बाध्य हैं और यह कि उन्हें अपनी खुद की पुकार सुनने का अवसर उपलब्ध नहीं है ।)
इन नये उपकरणों ने कला-संस्कृति की दुनिया को भी बदल डाला है । तकनीकी तौर पर संगीत, फिल्म जैसी विधाओं का डिजिटल कायाकल्प हुआ ही, चित्रकला, वास्तुकला, और यहाँ तक कि साहित्य भी इससे काफी प्रभावित हुआ है । सारवस्तु के तौर पर इन कलाविधाओं में आनेवाली नई प्रवृत्तियों का ठीक से मूल्यांकन होना अभी बाकी है । नैतिक मूल्यों में हो रहा बदलाव तो साफ-साफ परिलक्षित हो रहा है । ज्यादा नहीं, पच्चीस-तीस साल पहले प्रचलित मूल्यों से आज के कुछ स्वीकृत मूल्यों की तुलना कर देख लीजिए । सिर्फ लिंग के आधार पर ही नहीं, इन नये मूल्यों के आधारपर भी भाषाको खंगाला और स्वच्छ किया जा रहा है ।
विज्ञापन अगर औद्योगिक अर्थव्यवस्था की पहचान है तो ब्रांडिंग इस नई अर्थव्यवस्था की । विज्ञापन से ब्रांडिंग में यह संक्रमण भी मुख्यतः पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में संपन्न हुआ । विज्ञापन औद्योगिक उत्पादों का प्रचार था और पूंजी की परिचालन प्रक्रिया का अभिन्न अंग । ब्रांडिंग में उत्पाद पृष्ठभूमि में चला जाता है – ब्रांडों के रूप में उत्पाद मालों के रूप में प्रस्तुत नहीं किए जाते, बल्कि एक अवधारणा, अनुभव और जीवनशैली के रूप में पेश किए जाते हैं । ....ब्रांडों को केन्द्र कर एक कॉरपोरेट मिथक रचा जाता है – एक नाम का लोगो उत्पादों में नया अर्थ भर देता है (भले ही वे उत्पाद अत्यन्त दयनीय कार्यस्थितियोंवाले जकार्ता, मुम्बई, शंघाई, मनीला की उपनगरीय झुग्गी बस्तियों में हस्बमामूल कीमतों में बने हों) । ये ब्रांड निर्माता टॉम पीटर्स के शब्दों में प्योर प्लेअर्स इन ब्रेनवेयर (मस्तिष्क उत्पादों के खालिस खिलाड़ी) होते हैं । आइ बी एम कम्प्यूटर नहीं बेचती, बिजनेस सोल्यूशन्स बेचती है, स्वाच घड़ी नहीं समय का विचार है, और जैसा कि डीजल जीन्स के मालिक ने कहा, डीजल जीने की, पहनावे की, कुछ भी करने की एक शैली है, महज एक उत्पाद नहीं । नाइकी का मिशन जूते बेचना नहीं, खेल और फिटनेस के जरिए लोगों के जीवन को उन्नत करना और खेल के जादू को बरकरार रखना है । (नाओमी क्लेन) एअरटेल मोबाइल सेवाएँ प्रदान नहीं करती, हर फ्रेंड को जरूरी बनाती है ।
प्रायोजक के रूप में ब्रांड जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ कर जाता है । किसी चीज का प्रायोजन एक ही साथ उस चीज का अवमूल्यन भी है । प्रायोजित किए जानेवाले कार्यक्रमों की, चाहे वह कोई खेल हो, संगीत कार्यक्रम, नाटक या टेलीविजन धारावाहिक हो, अपनी ही पृथक, सैद्धान्तिक रूप से स्वायत्त सत्ता छिन जाती है और वे कॉमर्शियल्स के बीच पिरो दिए जाते हैं । प्रायोजकों के लिए इन कार्यक्रमों का अस्तित्व ही ब्रांड उन्नयन के लिए है । धीरे-धीरे एक प्रायोजित माइंडसेट बन जाता है – यह धारणा घर कर जाती है कि सृजनात्मक कार्यक्रमों तथा समारोहों का आयोजन ब्रांडों के उदार प्रायोजनों के बिना संभव ही नहीं है । (1991 में विश्वव्यापी पैमाने पर कॉरपोरेट प्रायोजन का कारोबार सालाना 7 अरब डॉलर का था जो महज आठ वर्षों में छलांग लगाकर, 1999 में 19.2 अरब डॉलर का हो गया ।) धार्मिक आयोजनों से लेकर शादियों, स्कूल तथा मोहल्ले के छोटे-मोटे कार्यक्रमों के लिए भी प्रायोजक खोजे जाने लगते हैं । (अगस्त, 1999 में अमेरिका में एक निजी शादी पहली बार कॉरपोरेट प्रायोजन में संपन्न हुई ।) वैसे इतिहास में कला-साहित्य और खेलकूद पहले भी प्रायोजित होते रहे हैं –प्रायः ऐसे प्रायोजक राजे-महाराजे अथवा समृद्ध भूस्वामी हुआ करते थे। उदाहरण देने की यहाँ जरूरत नहीं । लेकिन इस ब्रांडिंग और ब्रांड प्रायोजन की बात ही अलग  है । नाओमी क्लेन इसे दि एज ऑफ ब्रांडासॉरस की संज्ञा देती हैं ।
इसी प्रकार, शॉपिंग बाजार करना नहीं है, वह एक सांस्कृतिक अनुभव है, व्यग्र, व्याकुल प्राण का मनोवैज्ञानिक उपचार है, यौनानंद की सुखानुभूति है, रेव पार्टी भी है और आध्यात्मिक निर्वाण भी । अपनी जरूरी चीजों के लिए बाजार करना गरीबों का काम है । कौन कम्बख़्त जरूरी चीजें खरीदने के लिए शॉपिंग करता है ! शॉपिंग और शॉपोहोलिक्स की उन्माद भरी दुनिया में लौकिक जगत के भेद, जरूरी-गैरजरूरी, सच-झूठ, अच्छा-बुरा, सब मिट जाते हैं, और अलौकिक के आध्यात्मिक सुकून में मुद्रा विनिमय का साधन नहीं, खेलने की चीज बन जाती है । उन्माद में ही सही, यह विनिमय का, मुद्रा का अतिक्रमण है । ब्रांडिंग का उद्देश्य अपने ग्राहकों के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाना होता है । ....इसप्रकार, ब्रांडों के बाजार में विवेक का निपात घटित होता है । ब्रांड मस्तिष्क के निर्णय लेनेवाले उच्च क्षेत्रों को नहीं, बल्कि उसकी लिम्बिक प्रणाली, भावनात्मक मस्तिष्क को सम्बोधित होता है । इसने अर्थशास्त्र की एक नई शाखा न्यूरोइकोनोमिक्स (तंत्रिका-अर्थशास्त्र) को जन्म दिया है जिसका उद्देश्य बचत और खर्च से सम्बन्धित, बाजार में व्यवहार से सम्बन्धित तंत्रिका-प्रणाली का अध्ययन करना है ।

ग्वाङझू (चीन) का एक मॉल
यथार्थ जीवन में इसके परिणामस्वरूप, मध्यवर्ग के घरों में ढेर सारी अनावश्यक चीजों का अम्बार लगता जाता है और मस्तिष्क उत्पादों के स्वामी अरबों डॉलर के स्वामी बन बैठते हैं । ऐसे अनेक स्वामी अपने यथार्थ जीवन में खुद ये खेल नहीं खेलते, सादगी भरा जीवन जीते हैं, चैरिटी में जी खोलकर दान देते हैं, और समाज में उनके सादगीभरे जीवन की मिसाल दी जाती है । कैसिनो के मालिक खुद जुआ नहीं खेलते, जुए से तबाह हुए परिवारों की सहायता करनेवाली संस्थाओं को खुलकर दान देते हैं, या फिर खुद ही ऐसी संस्थाएँ खोलकर पुरस्कृत होते हैं ।
उपर्युक्त सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के दौर में एक नई परिघटना और जुड़ गई है । विश्वव्यापी शक्ति-संतुलन में परिवर्तन क्रमशः एक वास्तविकता का रूप ले रहा है । वैसे भविष्य के बारे में अभी निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, तथापि ऐसा लगता है कि करीब तीन सौ वर्षों बाद पश्चिमी देश वैश्विक राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में अपना वर्चस्व खोने जा रहे हैं । अन्य कारणों के अलावा इसका एक प्रमुख कारण चीन का उत्थान है – वैश्विक तथा क्षेत्रीय स्तर पर, आर्थिक और राजनीतिक मामलों में चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों का दखल बढ़ा है, और (रूस, जापान, जर्मनी, इंडोनेशिया, मेक्सिको, तुर्की, नाइजीरिया, आदि देशों के साथ) वे भावी वैश्विक शक्ति-संतुलन में भागीदारी के प्रबल दावेदारों के रूप में उभर रहे हैं ।
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ऊपर हमने अपनी आँखों के सामने घट रहे जिन परिवर्तनों का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया है, क्या वे इस बात के सबूत हैं कि हम मानव इतिहास के एक नये युग में दाखिल हो चुके हैं ? एक ऐसा नया युग जिसमें इतिहास का मुख्य क्रियास्थल (जन, भूमि, विनिमय से आगे निकलकर) खुद मानव-मस्तिष्क है ?
इस प्रश्न का आज के विचारक मुख्य रूप से दो उत्तर देते हैं । एक, अनेक विचारकों की नजर में यह कोई नया युग नहीं, पूंजीवादी (विनिमय के) युग का ही नया विकास है, नया चरण है । यह नया चरण नए अध्ययन और विश्लेषण की मांग अवश्य करता है, तथापि इसकी बुनियादी सारवस्तु वही है जो पूंजीवादी समाज की । दूसरा पक्ष इन परिवर्तनों की शिनाख्त नये युग के रूप में करता है और इसे ज्ञान युग की संज्ञा से अभिहित करता है । आखेटक-फलसंग्राहक समाज से कृषि समाज में, कृषि समाज से औद्योगिक समाज में होनेवाले ऐतिहासिक युग परिवर्तन की तरह, यह पक्ष इन विकासों को भी औद्योगिक समाज से ज्ञान समाज में परिवर्तन के तौर पर देखता है । दोनों पक्षों को विचारकों के बीच भी इन विकासों को लेकर, उनकी गति-प्रकृति को लेकर अनेक विवाद हैं, लेकिन सामान्य रूप में उपर्युक्त परिवर्तनों को लेकर यही दो पक्ष हैं । यह विवाद अब भी जारी है ।
यहाँ ज्ञान को लेकर एक संक्षिप्त स्पष्टीकरण अप्रासंगिक नहीं होगा । आरम्भिक काल से आजतक आध्यात्मिक और पंथों से सम्बन्धित साहित्य में ज्ञान का अर्थ व्यक्ति में उत्पन्न सार्विक भाव से, और विभिन्न पंथों के पवित्र ग्रंथों से अर्जित तथा अनुभूत शिक्षाओं से था । इसके अलावा, आदिम काल के पाषाण उपकरणों से लेकर आधुनिक मशीनों तक, हमारी सारी क्रियाओं में ज्ञान-तत्व रहता ही है – श्रमक्रिया की तरह ज्ञानक्रिया हमारे अस्तित्व का अनिवार्य अंग है । कहने की जरूरत नहीं कि आजकल हम ज्ञान का जिस अर्थ में प्रयोग करते हैं, वह न तो आध्यात्मिक-धार्मिक ज्ञान है, और न ही हमारे अस्तित्व के अनिवार्य अंग के रूप में सामान्य रूप से मौजूद ज्ञानक्रिया है । यह ज्ञान हमारी अन्तर्निहित ज्ञान-क्षमता और ज्ञानक्रिया का विशिष्ट रूप है – वह सूचना उत्पाद है । ज्ञान के संधान का मतलब नई-नई सूचनाओं का अनवरत् संधान है और ज्ञानक्रिया का अर्थ है सूचनाओं का प्रसंस्करण तथा विनिमय के लिए तैयार सूचना-उत्पादों का सृजन । कम्प्यूटर इसी क्रिया को संपन्न करनेवाला ज्ञान-उपकरण है । इस अर्थ में यह ज्ञानक्रिया औद्योगिक समाज में फैक्टरियों या कार्यालयों में किए जानेवाले मानसिक श्रम से भिन्न श्रेणी है । ....
मशीनीकरण और नये ज्ञान अर्थतंत्र की रचना में आवयविक अन्तर्सम्बन्ध है । लेकिन इसके विवरण में जाने से पहले औद्योगिक पूंजी के परिचालन की थोड़ी चर्चा अपेक्षित है । ....ज्ञान की पृष्ठभूमि में जाकर ही ज्ञान के संज्ञान की प्रक्रिया संपन्न होगी ।
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Sunday, May 27, 2012

ज्ञान का संज्ञान - 1


ज्ञान का संज्ञान - 1

प्रसन्न कुमार चौधरी











ये क्या जगह है
मानव इतिहास में पहली बार स्थूल पदार्थों तथा शक्तियों को विस्थापित कर अदृश्य सूक्ष्म कण और सूक्ष्म शक्तियाँ उत्पादन का प्रमुख उपकरण बन गई हैं । वैसे यह प्रक्रिया पिछले करीब डेढ़ सौ वर्षों से चल रही है, तथापि पिछली शताब्दी के 90 के दशक से इसने जीवन के सभी क्षेत्रों में निर्णायक स्थान ग्रहण कर लिया है । कार्यस्थल, बाजार, यातायात-केन्द्र, स्कूल, अस्पताल, रसोईघर, शयनकक्ष से लेकर अन्तरिक्ष तक, जीवन के छोटे-बड़े सभी क्षेत्र आज इन उपकरणों से न सिर्फ भर गए हैं, बल्कि इन सभी क्षेत्रों के नितान्त जरूरी उपकरण बन गए हैं । सूक्ष्म शक्तियाँ अगर ब्रह्माण्ड में विचरती आत्माएँ हैं, तो आज हम इन शक्ति-कणरूपी आत्माओं को वश में कर अपने उपयोग में लाने की कला कुछ-कुछ सीख गये हैं । यह मानवीय मेधा और प्रतिभा की आश्चर्यजनक, जादुई उपलब्धि है ।

उत्पादन के उपकरण जितने स्थूल होते हैं, उनमें स्थानिकता का तत्व उतना ही अधिक होता है । वे जितने सूक्ष्म होते हैं, उनमें उतनी ही अधिक सार्विकता होती है । वर्तमान वैश्वीकरण का आधार उत्पादन के यही सूक्ष्म उपकरण हैं । सार्विकता इन उपकरणों की अन्तर्निहित विशिष्टता है और इसीलिए उन्हें, निजी अथवा सामूहिक रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक रूप में ही ग्रहण किया जा सकता है । इस अर्थ में आज का वैश्वीकरण पूर्व के वैश्वीकरण से भिन्न है । ऐसा नहीं कि स्थूल उपकरणों की विदाई हो गई है – वे तो प्रचुर मात्रा में हैं और आगे भी रहेंगे । लेकिन उनका नियंत्रण अब सूक्ष्म कणों की दुनिया के हाथों में आ गया है । स्थूल पर सूक्ष्म का नियंत्रण

सत्येन्द्रनाथ बोस
पत्थर के हस्तकुठार तथा खंडकों से शुरू कर उन्नत यांत्रिक उपकरणों तक मानवजाति की विकास यात्रा अब अणु, परमाणु, इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, फोटोन, पोजीट्रोन, क्वार्क्स, ग्लुओन्स, आदि की दुनिया में जा पहुँची है । इस विकास की आधारशिला बीसवीं सदी के प्रथम अर्धांश में हुई क्वांटम क्रान्ति ने रखी (कृषि समाज का आधार नवपाषाण क्रान्ति थी और औद्योगिक समाज का आधार न्यूटोनियन क्रान्ति) । चूंकि यह प्रक्रिया आज पूरी रफ्तार से जारी है और हम इसी दुनिया में रह रहे हैं, इसलिए यहाँ हम नये विकासों की मूलभूत विशेषताएँ ही रखेंगे । स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए कुछ आँकड़े तथा उदाहरण देना तो जरूरी होगा, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि ये आँकड़े और उदाहरण आज की परिस्थिति में शीघ्र बासी होने को बाध्य हैं । आँकड़े हर क्षण बदलते रहते हैं । हम-आप नित्य नये दिलचस्प उदाहरणों से रोज-ब-रोज रू-ब-रू हो रहे हैं । एंडी ह्वार्लहोल की पन्द्रह मिनटों की प्रसिद्धि की दुनिया अब सेकण्डों में सिमट गई है ।
सूक्ष्मकणों और शक्तियों पर आधारित विकास के दो सबसे महत्वपूर्ण सूचक हैं: इंटरनेट और वेब । इन दोनों युग-परिवर्तनकारी आविष्कारों के पीछे वैज्ञानिकों-तकनीशियनों की गैर-स्वामित्वमूलक सह-क्रिया है । खुली प्रणालियों में नवाचार क्षमता का विश्लेषण करते हुए स्टीवन जॉन्सन नवाचार को चार श्रेणियों में बांटते हैं : पहला, एकाकी उद्यमी (जो वित्तीय लाभ की मंशा से अपने नवाचार को सुरक्षित रखता है) ; दूसरा, खोज या आविष्कार में आनंद पानेवाला गैर-पेशेवर व्यक्ति ; तीसरा, दूसरे निगमों के साथ प्रतिस्पर्धा में रहते हुए भी विचारों के बारे में आपस में सहयोग करनेवाले निजी निगम ; चौथा, सहयोगात्मक, गैर-स्वामित्ववाला नवाचार । इंटरनेट और वेब इसी चौथी श्रेणी का नवाचार था । इन दोनों आविष्कारों पर किसी का स्वामित्व नहीं है ।

ये नये उपकरण नये सामाजिक सम्बन्धों को जन्म दे रहे हैं और इन उपकरणों पर आधारित वैश्विकता जीवन के हर क्षेत्र को – आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, आदि को बड़े पैमाने पर बदल रही है । मानवजाति ने आखिरकार अपनी एक प्रतिरूप, वर्चुअल दुनिया का सृजन कर लिया है और उसकी यथार्थ तथा वर्चुअल दुनिया की परस्पर आवाजाही अनेक रूपों में संपन्न हो रही है । हमारे जीने का ढंग बदल रहा है ।

विश्व की एक तिहाई से भी ज्यादा आबादी इंटरनेट से जुड़ गई है और उसकी संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है । चीन में इंटरनेट इस्तेमाल करनेवालों की संख्या 50 करोड़ का आँकड़ा पार कर चुकी है (कुल आबादी का करीब 40 प्रतिशत) : इसमें 13 करोड़ लोग ग्रामीण इलाकों के हैं । चीन में सालाना करीब 80 अरब डॉलर का ऑनलाइन कारोबार होता है और इसमें भी निरंतर वृद्धि हो रही है – वहाँ करीब 20 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से और 1.3 करोड़ लोग अप्रत्यक्ष रूप से इलेक्ट्रॉनिक व्यवसाय से रोजगार पाते हैं । ....एक अनुमान के अनुसार, 2014 तक करीब तीस करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के साथ भारत संभवतः अमेरिका को पीछे छोड़ देगा । भारत में सालाना ऑनलाइन कारोबार वैसे तो चीन की तुलना में काफी कम (5 अरब डॉलर) है, लेकिन लगातार वृद्धि पा रहा है । मोबाइल उपभोक्ताओं का कहना ही क्या ? सिर्फ भारत और चीन में ही डेढ़ अरब से ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता हैं और उनकी संख्या भी प्रतिदिन बढ़ रही है । फेसबुक – वर्चुअल दुनिया के इस सबसे बड़े वर्चुअल देश की आबादी करीब 90 करोड़ है और उसकी भी अनवरत् वृद्धि जारी है । ट्विटर पर दस करोड़ लोग हैं : संकट काल में भी सोशल मीडिया का लगातार विस्तार हो रहा है – फेसबुक, ट्विटर के अलावा गूगल, गूगलप्लस, यूट्युब, लिंक्डइन, ग्रुपोन, यम्मर, येल्प, फ्लिकर, निंग, डिग, आदि । यह सूची लगातार बढ़ रही है । इनमें से कई के नाम तो पाँच साल पहले तक किसी ने सुना तक नहीं था । ये सब निजी कम्पनियां हैं, फेसबुक करीब सौ अरब डॉलर की कम्पनी है, तो ग्रुपोन 25 अरब डॉलर की । अगर एक अरब लोग प्रतिदिन एक घण्टा भी नेट पर व्यतीत करते हैं, तो यह एक अरब घण्टे का मानव श्रमकाल है ।

2010 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, तेरह से सत्रह वर्ष के अमेरिकी किशोर-किशोरी प्रतिमाह औसतन 3,339 टेक्स्ट मैसेज भेजते या प्राप्त करते हैं, किशोरियों में यह संख्या 4,000 से अधिक है । अरबों उंगलियाँ 24x7 मोबाइल या लैपटॉप के कीबोर्ड पर टिपटिपाती रहती हैं – सूचना के लिए, सम्पर्क के लिए, व्यवसाय और रोजगार के लिए, पढ़ने और अनुसंधान के लिए, संगीत रचने-सुनने-सुनाने, खेल खेलने या देखने, फिल्में देखने, समूह बनाने, प्रचार करने, आन्दोलन करने, प्रेम करने, शादी करने या तलाक लेने, पॉर्न देखने, छेड़ने, ठगने या लूटने, अड्डेबाजी करने, अपनी कुण्ठाएँ या भड़ाँस निकालने, घृणा फैलाने, अपराध का जाल बुनने, आदि,आदि के लिए।

इसके अलावा, टी वी चैनलों की विशाल दुनिया है, जहाँ ब्रुस स्प्रिंगस्टीन की फिफ्टी-सेवन चैनल्स एण्ड नथिंग ऑन (1992) की जगह 24x7 हजारों चैनल्स और एवरीथिंग ऑन वाली स्थिति है । शिशुओं से लेकर शतक-पार वृद्धों तक के लिए खबर, खेल, ज्ञान-विज्ञान, धारावाहिक, कार्टून, सैर-सपाटा, गीत-संगीत, स्वास्थ्य, हास्य, मौज-मस्ती, एडवेंचर, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र-पिशाच, धर्म-कर्म, आदि (अनेक भाषाओं में) सब कुछ उपलब्ध है । 24x7 दिनचर्या का वह अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और हमारे खान-पान, चाल-ढ़ाल, फैशन, साज-सज्जा, आदि को अनेक रूपों में प्रभावित कर रही है । बच्चे-बच्चियों से लेकर बूढ़े-बूढ़ियों तक के गपशप का एक अच्छा-खासा अंश अब टीवी पर देखे गए कार्यक्रमों का विषय होता है । अपने बाल-बच्चों की चिन्ता के साथ-साथ अपने पसंदीदा पात्रों की चिन्ता अब उनकी अपनी चिन्ताओं का हिस्सा बन गई है – वर्चुअल आनन्दी और अम्माजी उनके यथार्थ जीवन में कब का दाखिल हो चुकी हैं ।

दुनिया के दस, पचास या सौ धनकुबेरों में अब इन नये आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े धनपतियों की संख्या एक महत्वपूर्ण घटक बन गई है – ऐसे धनपति जिन्हें आज से एक, दो या तीन दशक पहले तक कोई नहीं जानता था । पहले के ऐतिहासिक कालों की तरह, इन नये धनिकों की पृष्ठभूमि भी काफी भिन्न है और वे समाज के विभिन्न वर्गों से आये हैं ।
क्वांटम क्रान्ति की पृष्ठभूमि में विज्ञान की कुछ नयी शाखाओं (उपग्रह तकनालॉजी, आण्विक जीवविज्ञान, नैनो तकनालॉजी, बायोतकनालॉजी, आनुवंशिकी विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, आदि) का तेजी से विस्तार हुआ है । इनमें से कुछ शाखाएँ तो पहले से विद्यमान थीं, तथापि शक्तिशाली कम्प्यूटरों के विकास ने उन्हें नया आवेग प्रदान किया – ऐसे कम्प्यूटरों के अभाव में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट को इतनी जल्दी कामयाबी नहीं मिलती । आगे से हम इन सभी अभिनव शाखाओं को सम्मिलित रूप से नये विज्ञान के रूप में सम्बोधित करेंगे । जन्म से मृत्यु पर्यन्त नये विज्ञान पर आधारित तकनीकी उपकरण हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं – कुलमिलाकर, हमारे शरीर का अजैव अंग

इन उपकरणों ने बिल्कुल नये श्रम-विभाजनों को जन्म दिया है । जीविका/वृत्ति के बिल्कुल नये क्षेत्र और उसके लिए जरूरी शिक्षा के नये क्षेत्र सामने आये हैं । देखते-देखते कस्बों तथा गांवों तक उनका विस्तार हो गया है । कुछ पुरानी वृत्तियाँ बेमानी हो गई हैं, अनेक पुरानी वृत्तियाँ अपना महत्व खो चुकी हैं, और उनकी जगह नये-नये किस्म के कार्यों तथा कौशल का महत्व बढ़ा है ।
इन उपकरणों पर आधारित सूचना-संचार उद्योग अब सबसे ज्यादा धन पैदा करनेवाला क्षेत्र बन गया है । अनेक देशों में सकल घरेलू उत्पाद में उसका हिस्सा कृषि और मैन्युफैक्चरिंग को पीछे छोड़कर सबसे बड़ा घटक बन गया है । सेवा उद्योग का बड़ा हिस्सा अब इन कम्प्यूटर-आधारित सेवाओं का है । देश के सकल घरेलू उत्पाद में ही नहीं, बल्कि एक आम मध्यवर्गीय परिवार के घरेलू बजट में भी (खाद्यान्न तथा अन्य जरूरी चीजों पर किए जानेवाले खर्च की तुलना में) विभिन्न सेवाओं के लिए चुकाए जानेवाले सेवा-शुल्कों का हिस्सा निरन्तर बढ़ रहा है ।
विभिन्न सेवाओं की मांग बढ़ रही है और अधिकार के रूप में सेवाएँ प्राप्त करने से सम्बन्धित कानून भी बन रहे हैं । सूचना का अधिकार, डिजिटल अधिकार  के साथ-साथ गवर्नेंस के क्षेत्र में इन उपकरणों के बहुविध उपयोग का भी तेजी से विस्तार हो रहा है । इसके अलावा, संगठनों के निर्माण, आन्दोलनों के लिए गोलबन्दी तथा उनके संचालन में भी इन उपकरणों का अब बड़े पैमाने पर प्रयोग होने लगा है । हाल के दिनों में भारत समेत विभिन्न देशों में होनेवाले बड़े-बड़े नागरिक आन्दोलनों में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है ।
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(जारी)

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