ज्ञान की पृष्ठभूमि
प्रसन्न कुमार चौधरी
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| चार्ली चैप्लिन (मॉडर्न टाइम्स) |
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मशीनीकरण, मुक्त समय और मार्क्स
अब
हम मशीनीकरण के स्वाभाविक विकास-क्रम में उत्पन्न स्थितियों, औद्योगिक
उत्पादन-प्रणाली पर उसके प्रभाव तथा नई अर्थव्यवस्था के साथ उसके आवयविक
अन्तर्सम्बन्धों की चर्चा करेंगे । यहाँ हम मशीनीकरण की स्वाभाविक गति-प्रकृति के
बारे में कार्ल मार्क्स के विश्लेषण से प्रस्थान करेंगे :
" पूंजी की उत्पादन
प्रक्रिया में समाहित कर लिए जाने के बाद श्रम के उपकरण विभिन्न कायान्तरणों से
गुजरते हैं जिनकी परिणति मशीन है, अथवा कहना चाहिए कि, मशीनरी की एक
स्वचालित प्रणाली है । (स्वचालित मशीनरी मशीनरी प्रणाली का सबसे मुकम्मल, सबसे
परिपूर्ण रूप है और एकमात्र वही मशीनरी को एक प्रणाली में रूपान्तरित करती
है) .... अनेक यांत्रिक तथा बौद्धिक घटकों से युक्त इस स्वचालन में मजदूर महज उसकी
सचेत कड़ियों के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं । .... मजदूर की कार्यवाही का,
कार्यवाही के महज अमूर्तन के रूप में निपात घटित होता है । उसकी कार्यवाही
चारो ओर से मशीनरी की गति द्वारा निर्धारित और नियंत्रित होती है । अपनी रचना
के जरिए विज्ञान मशीनरी के निर्जीव पुर्जों को स्वचालन के रूप में लक्ष्योन्मुख
क्रिया के लिए बाध्य करता है, लेकिन यह विज्ञान मजदूर की चेतना में अस्तित्वमान
नहीं होता । वह तो एक पराई शक्ति के रूप में, खुद मशीन की शक्ति के रूप में मशीन
के जरिए उसपर क्रिया करता है । .... उत्पादन प्रक्रिया अपनी नियामक एकता के रूप
में श्रम की प्राबल्यवाली प्रक्रिया के अर्थ
में एक श्रम प्रक्रिया नहीं रह जाती । श्रम तो बस एक सचेत घटक के रूप में,
मशीनरी प्रणाली के अनेक स्थलों पर व्यक्ति मजदूरों के बीच बिखरे रूप में उपस्थित
होता है । ....श्रम की उत्पादक शक्ति में इजाफा और आवश्यक श्रम का अधिकतम संभव
निषेध पूंजी की अनिवार्य प्रवृत्ति है, यह हम पहले देख चुके हैं । श्रमके उपकरणों
का मशीनरीमें रूपान्तरण इसी प्रवृत्ति की उपलब्धि है । .... (मशीनरी, वैसे तो खुद
संचित, मूर्त श्रम है, वस्तु रूप में मूल्य है, लेकिन वह खुद स्थिर पूंजी के रूप
में मूल्य-सर्जक भूमिका में उपस्थित होती है, जिसकी तुलना में श्रमशक्ति की
मूल्य-सर्जक शक्ति दिनोंदिन क्षीण होती जाती है ।) ज्ञान और कौशल के, सामाजिक
मस्तिष्क की आम उत्पादक शक्तियों के संचय को, श्रम के विरुद्ध पूंजी में आत्मसात
कर लिया जाता है, और वह पूंजी के, खास तौर पर स्थिर पूंजी के (जिस हद तक बतौर
उत्पादन के साधन वह उत्पादन प्रक्रिया में शामिल होता है) गुण के रूप में उपस्थित
होता है । इस प्रकार, मशीनरी स्थिर पूंजी के सबसे परिपूर्ण रूप में, और
....स्थिर पूंजी खुद पूंजी के सबसे परिपूर्ण रूप में सामने आती है । .... इसके
अलावा, जहाँ तक मशीनरी समाज के विज्ञान के, सामान्यतः उत्पादक शक्ति के संचय के
साथ विकसित होती है, आम सामाजिक श्रम खुद को श्रम में नहीं, बल्कि पूंजी में
प्रस्तुत करता है ।
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| कार्ल मार्क्स (1818-1883) |
मशीनरी आम तौर पर श्रम के औजार के रूप में, एक भौतिक वस्तु के
रूप में अपना प्रत्यक्ष रूप खो देती है । वह स्थिर पूंजी हो जाती है और भौतिक रूप
से पूंजी के रूप में मजदूर के आमने-सामने होती है । मशीनरी में, ज्ञान
मजदूर के समक्ष एक बाहरी, पराई चीज के रूप में और सजीव श्रम आत्म-क्रियाशील मूर्त
श्रम के अधीनस्थ के रूप में उपस्थित होता है । जिस हद तक उसका कार्य (पूंजी की)
जरूरतों द्वारा निर्धारित नहीं होता, मजदूर उस हद तक फालतू प्रतीत होता है । ....
पूरी उत्पादन प्रक्रिया मजदूर के प्रत्यक्ष कौशल के अधीन संपन्न होती नहीं दिखती,
बल्कि विज्ञान के तकनालॉजिकल प्रयोग के रूप में उपस्थित होती है । इस प्रकार,
उत्पादन को एक वैज्ञानिक चरित्र प्रदान करना पूंजी की प्रवृत्ति है ; प्रत्यक्ष श्रम इस प्रक्रिया में महज एक क्षण के रूप में परिणत हो जाता है ।
.... (मजदूर का श्रम परिचालित पूंजी के बस एक गुण के रूप में सामने आता है और
परिचालित पूंजी के रूप में पूंजी विभिन्न मजदूरों के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश
आती है ।) ऐतिहासिक रूप से मशीनरी का प्रयोग खुद फालतू हाथों की पूर्वापेक्षा करता
है । मशीन का प्रवेश (श्रम को विस्थापित करने के लिए) खुद नहीं होता है, जहाँ
श्रमशक्ति की आपूर्ति जरूरत से ज्यादा हो । वह, जैसा कि अर्थशास्त्रीगण कल्पना
करते हैं, श्रमशक्ति के अभाव की स्थिति में, श्रमिक की सहायता के लिए नहीं आता ।
पूंजी के अनुपात में जहाँ श्रमशक्ति का संकेन्द्रण जरूरत से ज्यादा होता है,
मशीनरी वहीं स्थापित की जाती है, ताकि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध श्रमशक्ति को अपनी
जरूरी मात्रा तक ही सीमित रखा जाए । ....
मशीनरी में, पूंजी द्वारा सजीव श्रम का आत्मसातीकरण एक प्रत्यक्ष यथार्थ की
शक्ल ले लेता है । अव्वल तो सीधे विज्ञान से हासिल यांत्रिक और रासायनिक नियमोंका विश्लेषण और प्रयोग मशीन को वह काम करनेमें सक्षम बनाता है जो पहले मजदूरों
द्वारा किया जाता था । बहरहाल, इस राह पर मशीनरी का विकास सिर्फ तब ही घटित होता
है जब बड़े उद्योग अपने विकास की उच्चतर अवस्था में पहुँच चुके होते हैं, और सारा
विज्ञान पूंजी की सेवा में हाजिर हो चुका होता है । दूसरे, जब उपलब्ध मशीनरी खुद
पहले से ही विराट क्षमताएँ प्रदान करती होती है । तब अनुसंधान एक व्यवसाय बन जाता
है । और प्रत्यक्ष उत्पादन में विज्ञान का प्रयोग खुद एक निर्धारक एवं अपेक्षित
संभावना बन जाता है ।
लेकिन यह वह राह नहीं है जिस पर चलकर मशीनरी का कमोबेश उद्भव हुआ – वह राह तो
और भी नहीं जिस पर चलकर आगे उसका और विस्तार हो रहा है । वह राह तो विभाजन की
है – श्रमविभाजन के जरिए मजदूरों के कार्य क्रमशः यांत्रिक क्रियाओं में अधिकाधिक
रूपान्तरित होने लगे और एक खास बिन्दु पर जाकर मशीनरी द्वारा उनकी जगह लेना संभव
हो गया । इस प्रकार, कार्य की यह विशिष्ट प्रणाली यहाँ प्रत्यक्षतः मशीन की शक्ल
में मजदूर से पूंजी में बदल जाने के रूप में प्रकट होती है, और इसप्रकार खुद उसकी
श्रमशक्ति का अवमूल्यन घटित होता है । इसीलिए मशीनरीके खिलाफ मजदूरोंका संघर्ष
जन्म लेता है । मजदूर की सजीव सक्रियता मशीन की सक्रियता बन जाती है । इसप्रकार
पूंजी द्वारा श्रम का आत्मसातीकरण मजदूर के समक्ष एक भोंडे कामुक रूप में अवतरित
होता है ; पूंजी श्रम को अपने आप
में समा लेती है – ‘मानो उसका शरीर प्रेम
के वशीभूत हो गया हो । ’ (गेएठे; ‘फॉस्ट’, पार्ट 1, एक्ट 5)
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| रोबोटिक असेम्बली लाइन |
मूर्त श्रम के लिए सजीव श्रम का विनिमय – अर्थात पूंजी और श्रमशक्ति के
अन्तर्विरोध के रूप में सामाजिक श्रम की प्रस्तुति – मूल्य-सम्बन्ध और मूल्य पर
आधारित उत्पादन का चरम विकास है । इसका आधार है सम्पत्ति के उत्पादन में निर्धारक
कारक के रूप में नियोजित श्रम की मात्रा, प्रत्यक्ष श्रमकाल की अवधि । लेकिन
बड़े उद्योग के विकास की एक सीमा के बाद, वास्तविक सम्पत्ति का निर्माण नियोजित
श्रम की मात्रा और श्रमकाल पर कम-से-कम निर्भर होता जाता है । वह तो अधिकाधिक
श्रमकाल के दौरान क्रियाशील की गई एजोन्सियों की शक्ति पर निर्भर होता जाता है ।
उन एजेन्सियों (मशीनरी) की ‘शक्तिशाली क्षमता ’ भी अपने उत्पादन पर लगे
प्रत्यक्ष श्रमकाल की तुलना में विज्ञान की आम स्थिति, तकनालॉजी की प्रगति अथवा
उत्पादन में इस विज्ञान के प्रयोग पर अधिकाधिक निर्भर होती जाती है । .... श्रम अब उत्पादन
प्रक्रिया के अन्दर भागीदार के रूप में उतना उपस्थित नहीं दिखता – मनुष्य की
भूमिका चौकीदार के रूपमें या उत्पादन-प्रक्रिया के नियंत्रक के रूपमें अधिक नजर
आती है । ..पराये श्रमकाल की चोरी, जिसपर मौजूदा सम्पत्ति आधारित है, खुद बड़े
उद्योग द्वारा सृजित इस नयी सम्पत्ति के समक्ष दयनीय आधार साबित होती है । जैसे
ही प्रत्यक्ष रूप में श्रम सम्पत्ति का विराट स्रोत नहीं रह जाता, श्रमकाल उसका
मापदण्ड भी नहीं रह पाता है और न ही उसे रहना चाहिए । उसी तरह उपयोग मूल्य के
मापदण्ड के रूप में विनिमय मूल्य की भूमिका भी समाप्त हो जानी चाहिए । जनसमुदाय का
अतिरिक्त श्रम सामान्य सम्पत्ति के विकास की शर्त नहीं रह जाता, और उसी तरह
कुछ लोगों का श्रम से मुक्त रहना मानव मस्तिष्क की आम शक्तियों के विकास के लिए
जरूरी नहीं रह जाता । इसके साथ ही विनिमय मूल्य पर आधारित उत्पादन भी विघटित हो
जाता है । ....
समाज के आवश्यक श्रम में न्यूनतम हद तक गिरावट और उसी के अनुरूप मुक्त हुए
समय में, और निर्मित साधनों के साथ, (सभी के लिए) व्यक्ति का कलात्मक,
वैज्ञानिक, आदि विकास .... पूंजी खुद एक गतिशील अन्तरविरोध है, इस अर्थ में कि एक
ओर तो वह श्रमकाल को न्यूनतम हद तक कम करने का दबाव बनाती है, और दूसरी ओर उसी
श्रमकाल को सम्पत्ति के एकमात्र मापदण्ड और स्रोत के रूप में प्रस्तुत करती है ।
इसीलिए वह आवश्यक रूप से श्रमकाल को कम करती जाती है ताकि फाजिल रूप में
उसकी वृद्धि हो ; बढ़ता हुआ फाजिल
काल आवश्यक श्रमकाल के लिए – जीवन-मरण का प्रश्न – एक शर्त बन जाता है । एक ओर
वह विज्ञान तथा प्रकृति की सारी शक्तियों का, सामाजिक संयोजन तथा सामाजिक
सह-क्रिया का आवाहन करती है ताकि सम्पत्ति का सृजन (सापेक्ष रूप से) उस पर व्यतीत
श्रमकाल से स्वतंत्र हो जाये । दूसरी ओर, वह इस प्रकार सृजित विराट सामाजिक
शक्तियों के मापदण्ड के रूप में श्रमकाल का प्रयोग करना चाहती है और पहले ही सृजित
मूल्य को मूल्य के रूप में बरकरार रखने के लिए जरूरी सीमाओं के भीतर ही उन सामाजिक
शक्तियों को कैद रखना चाहती है । उत्पादन की शक्तियाँ और सामाजिक सम्बन्ध –
सामाजिक व्यक्ति के विकास के दो भिन्न पक्ष – पूंजी के समक्ष महज साधन के रूप में
अवतरित होते हैं और वे सीमित आधार पर उत्पादन के लिए पूंजी के महज साधन ही हैं ।
बहरहाल, वे इस आधार को दरअसल आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाने की भौतिक स्थितियाँ हैं
। ‘सच्चा समृद्ध राष्ट्र वही है, जहाँ कार्यदिवस बारह
घण्टे की जगह छः घण्टे है । सम्पत्ति अतिरिक्त श्रमकाल पर कमान हासिल करना नहीं
है । (वास्तविक सम्पत्ति तो) फाजिल समय पर, प्रत्येक व्यक्ति और समूचे समाज के
लिए, प्रत्यक्ष उत्पादन में आवश्यक समय के बाहर फाजिल समय पर नियंत्रित करना है । ’ ....
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| कम्प्यूटर डिसप्ले प्रोडक्शन लाइन |
प्रकृति कोई मशीन नहीं बनाती, न इंजन, न रेलगाड़ी, न विद्युत टेलीग्राफ, न
स्वचालित यंत्र, आदि । वे मानवीय उद्यम के उत्पाद हैं ; वे प्रकृति के ऊपर मानवीय इच्छा शक्ति के, अथवा प्रकृति में मानवीय भागीदारी
के अंग के रूप में रूपान्तरित प्राकृतिक संसाधन हैं । वे मानवीय हाथों द्वारा
सृजित मानव मस्तिष्क के साधन हैं । ज्ञान की शक्ति, मूर्तिमान । स्थिर पूंजी का
विकास इस बात का सूचक है कि आम सामाजिक ज्ञान किस मात्रा में प्रत्यक्ष उत्पादन
शक्ति बन गया है । और इसीलिए, सामाजिक जीवन प्रक्रिया की स्थितियाँ खुद किस हद तक
आम बुद्धि के नियंत्रण में आ चुकी है और उसके अनुरूप ढ़ल चुकी है । ....
आम तौर पर समाज के लिए और समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक श्रमकाल से
अलग फाजिल समय का बड़ी मात्रा में सृजन (दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की, और इसीलिए
समाज की उत्पादक शक्तियों के पूर्ण विकास के लिए अवसर का सृजन) – पूंजी के (विकास
के) चरण में ऐसे फाजिल समय का सृजन, जो श्रमकाल नहीं है, सामने आता है । (पूंजी-पूर्व के) सभी
समाजों में भी यह फाजिल (खाली) समय (जो श्रमकाल नहीं है) दिखाई देता है, लेकिन तब
वह कुछ लोगों को ही उपलब्ध हुआ करता था । पूंजी ने इसमें जो योगदान किया है, वह है
कला और विज्ञान के समस्त साधनों के द्वारा जनसमुदाय के अतिरिक्त श्रमकाल में
वृद्धि, क्योंकि इसकी सम्पत्ति अतिरिक्त श्रमकाल के प्रत्यक्ष अपहरण में निहित है –
उपयोग मूल्य नहीं, बल्कि (विनिमय) मूल्य हासिल करना ही इसका प्रत्यक्ष प्रयोजन है
। इसप्रकार, (और इसके बावजूद), इसने सामाजिक रूप से फाजिल समय के साधनों के
निर्माण में सहायक की भूमिका अदा की है, ताकि पूरे समाज के लिए श्रमकाल को न्यूनतम
हद तक कम किया जा सके, और इसप्रकार अपने विकास के लिए सभी को मुक्त समय उपलब्ध हो
सके । लेकिन इसकी प्रवृत्ति हमेशा, एक ओर, फाजिल समय का सृजन करने, तथा दूसरी
ओर, इसे अतिरिक्त समय में बदलने की रही है । यदि वह पहले कार्य में बहुत ज्यादा
सफलता हासिल करती है तो वह अतिउत्पादन का शिकार हो जाती है और तब आवश्यक श्रम भी
बाधित हो जाता है, क्योंकि पूंजी कोई अतिरिक्त श्रम हासिल नहीं कर पाती । यह
अन्तरविरोध जितना ही बढ़ता जाता है, उतना ही ज्यादा यह स्पष्ट हो जाता है कि
उत्पादक शक्तियों का विकास अब पराये श्रम के अपहरण के साथ बँधा नहीं रह सकता, कि मजदूरों
को खुद ही अपने अतिरिक्त श्रम को अपने अधिकार में ले लेना होगा । एक बार यदि वे
ऐसा कर लेते हैं तो फाजिल समय का विरोधमूलक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । तब, एक ओर,
आवश्यक श्रमकाल सामाजिक व्यक्ति की आवश्यकताओं द्वारा मापा जाएगा, और दूसरी ओर,
सामाजिक उत्पादन की शक्ति का विकास इतनी तेजी से होगा कि, यद्यपि अब सभी की
सम्पत्ति के लिए उत्पादन की गणना होगी, तथापि सभी के लिए फाजिल समय में वृद्धि
होगी, क्योंकि वास्तविक सम्पत्ति सभी व्यक्तियों की विकसित उत्पादक शक्ति है । सम्पत्ति
का मापदण्ड तब किसीभी रूपमें श्रमकाल नहीं रह जाएगा, बल्कि प्रयोज्य काल हो
जाएगा । .... ‘अगर किसी देश का
सम्पूर्ण श्रम पूरी आबादी के निर्वाह मात्र पर ही खर्च हो जाता है, तो अतिरिक्त
श्रम जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं होगा, और परिणामस्वरूप ऐसी कुछ चीज भी
नहीं रहेगी, जिसे पूंजी के रूप में संचित किया जा सके । यदि एक साल में लोग दो साल
के निर्वाह के लायक उत्पादन कर लेते हैं, तो एक साल लोग उत्पादक श्रम स्थगित कर
सकते हैं । लेकिन अतिरिक्त उत्पाद अथवा पूंजी के स्वामी ....लोगों को कुछ ऐसे काम
में नियोजित कर देते हैं जो प्रत्यक्षतः और तात्कालिक रूप से उत्पादक नहीं है,
जैसे मशीनरी की स्थापना । इस तरह यह प्रक्रिया चलती रहती है । ’ ....
श्रमकाल की बचत खाली समय, यानी व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए समय, की वृद्धि
के बराबर है । ....प्रत्यक्ष उत्पादन-प्रक्रिया की स्थिति से इसे स्थिर पूंजी के उत्पादन के रूप
में देखा जा सकता है, यहाँ स्थिर पूंजी खुद मनुष्य है । बहरहाल, कहने की
जरूरत नहीं कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के परिप्रेक्ष्य से जिस रूप में यह उपस्थित
होता है, उस रूप में प्रत्यक्ष श्रमकाल खुद खाली समय के निरपेक्ष विरोध में बरकरार
नहीं रह सकता । .... खाली समय – जो एक ही साथ फालतू समय और उच्चतर कार्यों
के लिए समय भी है – अपने स्वामी को स्वभावतः एक भिन्न व्यक्ति में बदल देता
है, और वह तब इस भिन्न व्यक्ति के रूप में प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया में शामिल
होता है ।
....
बुर्जुआ अर्थव्यवस्था की प्रणाली हमारे लिए जैसे क्रमिक रूप से विकसित हुई है,
उसी तरह उसका निषेध भी, जो उसकी अन्तिम परिणति है । हमारा वास्ता अब भी प्रत्यक्ष
उत्पादन प्रक्रिया से है । जब हम बुर्जुआ समाज को एक लम्बे फलक पर और सम्पूर्णता
में देखते हैं तो सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया का अन्तिम परिणाम हमेशा खुद समाज
के रूप में उपस्थित होता है । स्थिर रूपवाला सबकुछ, जैसे उत्पाद, आदि महज एक क्षण
के रूप में, इस गति की प्रक्रिया के विलुप्त होते क्षण के रूप में उपस्थित होता है
। प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया खुद महज एक क्षण के रूप में अवतरित होती है । इस
प्रक्रिया की स्थितियाँ और वस्तु-रूपों में उसके रूपान्तरण, समान रूप से, उसके
क्षण ही हैं । व्यक्ति, (लेकिन) पारस्परिक सम्बन्धों में बँधे व्यक्ति ही इसके
एकमात्र विषय हैं – इन सम्बन्धों को भी वे उसी तरह पुनरुत्पादित और नये सिरे से
उत्पादित करते रहते हैं । यह उनकी अपनी गति की सतत् प्रक्रिया है, जिसमें वे खुद
अपने द्वारा सृजित सम्पत्ति की दुनिया का पुनर्नवीकरण करते हुए अपना पुनर्नवीकरण
भी करते रहते हैं । .... "
मार्क्स की ‘ ग्रुंड्रिसे ’ (फरवरी 1858 से जून 1858 के आरम्भ के बीच लिखी
गई नोटबुक VI और VII) के कुछ अंशों के
लम्बे उद्धरण का अभिप्राय यह दिखलाना था कि किस तरह औद्योगिक उत्पादन-प्रणाली के
विकास, मशीनीकरण ने, खुद ऐसी वस्तुगत स्थितियाँ उत्पन्न कीं जिनपर आधारित होकर एक नई
अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है । [ हम पहले देख चुके हैं कि किस प्रकार यह नई अर्थव्यवस्था औद्योगिक-वित्तीय
पूंजी के साथ जुड़कर आगे बढ़ी । पूंजी के परिचीलन की प्रक्रिया में सूचना-उत्पादों
के रूप में ज्ञान का निवेश मशीनीकरण (स्थिर पूंजी) के साथ जुड़कर अतिरिक्त मूल्य
के विस्तार का नया स्रोत बन गया, और इस प्रकार अतिरिक्त मूल्य के स्रोत के रूप में
श्रमशक्ति की भूमिका का और अवमूल्यन घटित हुआ । लेकिन शीघ्र ही यह ज्ञान-उद्योग
औद्योगिक-वित्तीय पूंजी से स्वतंत्र हो गया और उसने मुक्त समय तथा ज्ञान-उत्पादों
के पारस्परिक विनिमय पर आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में काफी तेजी से विस्तार लाभ
किया । ] ………………….
( ‘ग्रुंड्रिसे’ से उद्धृत अंशों का हिन्दी रूपान्तर लेखक द्वारा । )
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