Saturday, February 25, 2012

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' - 2


सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय – 2

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'
(7.3.1911-4.4.1987)



















जैसे तुझे स्वीकार हो

जैसे तुझे स्वीकार हो !
डोलती डाली, प्रकम्पित पात, पाटल-स्तम्भ विलुलित
खिल गया है सुमन मृदु-दल, बिखरते किंजल्क प्रमुदित
स्नात मधु से अंग रंजित-राग केशर अंजली से
                स्तब्ध सौरभ है निवेदित,
मलय-मारुत, और अब जैसे तुझे स्वीकार हो ।

पंख कम्पन-शिथिल, ग्रीवा उठी, डगमग पैर,
                        तन्मय दीठ अपलक –
कौन ऋतु है, राशि क्या है, है कौन-सा नक्षत्र, गत-शंका, द्विधा-हत,
बिन्दु अथवा वज्र हो –
चंचु खोले आत्मविस्मृत हो गया है यती चातक –
स्वाति, नीरद, नील-द्युति, जैसे तुझे स्वीकार हो ।

अभ्र लख भ्रू-चाप-सा, नीचे प्रतीक्षा स्तिमित निःशब्द
धरा पाँवर-सी बिछी है, वक्ष उद्वेलित हुआ है स्तब्ध
चरण की ही चाप किंवा छाप तेरे तरल चुम्बन की –
महाबल हे इन्द्र, अब जैसे तुझे स्वीकार हो ।

मैं खड़ा खोले हृदय के सभी ममता द्वार,
नमित मेरा भाल, आत्मा नमित-तर, है नमित-तम
                              मम भावना संसार,
फूट निकला है न जाने कौन हृत्तल बेधता-सा
                         निवेदन का अत्तल पारावार,
अभय-कर हो, वरद-कर हो, तिरस्कारी वर्जना, हो प्यार
तुझे, प्राणाधार, जैसे हो तुझे स्वीकार –
सखे, चिन्मय देवता, जैसे तुझे स्वीकार हो !

[‘जैसे तुझे स्वीकार हो शीर्षक कविता दिल्ली की एक पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो एक कृपालु पत्रकार ने एक स्थानीय पत्र में उस का अर्थ करने के लिए पुरस्कार घोषित किया । शर्त यह थी कि अर्थ ही किया जाये, व्याख्या न की जाये । मेरा अनुमान था कि इस जाल में कुछ लोग अवश्य फँसेंगे, और हुआ भी ऐसा ही – कुछ उत्साही व्यक्तियों ने (मेरा पक्ष लेने के लिए मैं उनकी सदिच्छा का क़ायल तो हूँ पर उनके सद्विवेक का नहीं !) अर्थ करके भेजा, और उत्तर पाया कि यह तो अर्थ नहीं, व्याख्या है । एक बार अचानक इस आशय का एक कार्ड एक मित्र के घर देख कर (कार्ड और किसी के नाम था किन्तु डाकिये की भूल से वहाँ चला आया था) मैंने सोचा कि कविता का अर्थ स्वयं करना चाहिए । अतः छद्मनाम से सम्पादक के नाम इस आशय का पत्र लिखकर कि इन महाकवि की कविता इतनी गूढ़ होती है कि साधारण गद्य में उसकी व्याख्या ही हो सकती है, अर्थ नहीं; अतः मैं उस का अर्थ पद्य में करके भेज रहा हूँ; आशा है आप इस सर्वथा सम्पूर्ण अर्थ को प्रकाशित कर देंगे ।मैंने यह पैरोडी भेज दी जो पत्र में सम्पादकीय नोट के साथ छपी भी ।
पत्रकार सज्जनों को पुरस्कार देना नहीं था, अतः वह तो मुझे नहीं मिला, पर वैसे मैं ने समझा कि प्रकाशन ही काफी पुरस्कार है; क्योंकि वे अभी तक नहीं जानते कि लिखे ईसा पढ़े मूसाकी इस कहानी में ईसा ही मूसा है । आशा है वे मुझे क्षमा कर देंगे क्योंकि मेरा आचरण शास्त्र-सम्मत है, पत्रकारे पत्रकारत्वं – इति हितोपदेशः]

जयतु हे कण्टक चिरन्तन !

जय, सदा जय हो !
प्रबल झंझा के थपेड़ों से पिटे हैं फूल –
भूमि पर, नभ पर, पवन के चक्षुओं में भी भरी है धूल,
काव्य के झंखाड़ में बाक़ी बचे बस
निविड़ छायावाद के निष्प्राण रूखे शूल -
जयतु हे कण्टक चिरन्तन, जय सदा जय हो ।
नेत्र विस्फारित, अचम्भित दृष्टि, हृद्गति स्तब्ध,
                           सहमी बुद्धि भौंचक
आह यह निर्लज्ज पाठक है नहीं अभिभूत अब तक,
आस में बैठा हुआ है –
पैर चुभती ठीकरी भी यह कभी हो जाय रोचक –
किन्तु कविते ! कुलिश-सी कटु क्लिष्ट
लौह के हे चणक, जय, तेरी सदा जय हो ।

बिछ गये हैं रबड़ के ये छन्द ज्यों शैतान की हों आँत,
हैं प्रतीक्षा के पुलक में कवि सभी अपने निपोरे दाँत
तालियाँ हो, गालियाँ हो, चप्पलों की मार, घूँसे-लात,
महाबल हे काव्य-रजनी के निशाचर, जय सदा जय हो ।

मैं खड़ा खोले सभी कटिबन्ध पिंगल के,
मुक्त मेरे छन्द, भाषा मुक्ततर, हैं मुक्ततम मम
                             भाव पागल के ।
ज्ञेय हो, दुर्ज्ञेय हो, अज्ञेय निश्चय हो,
अर्थ के अभिलाषियों से सतत निर्भय हो,
असुर दुर्दम, दैत्य-कवि, तेरी सदा जय हो !
जय, पुनः जय सदा जय जय,
जय, सदा जय हो !

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