Tuesday, July 3, 2012

ज्ञान अर्थशास्त्र - 1

ज्ञान अर्थशास्त्र का विकास - 1

प्रसन्न कुमार चौधरी

कार्ल मार्क्स, 1818-1883
अर्थशास्त्र की एक शाखा के रूप में ज्ञान अर्थशास्त्र का विकास वैसे तो काफी नई परिघटना है और यह अभी भी एक विकासमान ज्ञानानुशासन है, तथापि इसकी शुरुआत हम कार्ल मार्क्स से ही करेंगे । उनके समय में क्वांटम क्रान्ति नहीं हुई थी, कम्प्यूटर जैसे उपकरण विकसित नहीं हुए थे, इंटरनेट तथा वर्ल्डवाइडवेब की तो तब कल्पना भी संभव नहीं थी । फिर भी वे बिल्कुल आज की शब्दावली में उन सारी स्थितियोंका विलक्षण सूत्र प्रस्तुत करते हैं जिनसे हम आज रू-ब-रू हैं। कहने की जरूरत नहीं कि वे यह सब औद्योगिक पूंजीवाद के परिप्रेक्ष्य में, स्थिर पूंजी और परिचालित पूंजी के संदर्भ में कर रहे थे । यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि आज की ज्ञान अर्थव्यवस्था औद्योगिक अर्थतंत्र पर ही फली-फूली है और यह कि विनिमय पर आधारित आर्थिकप्रणालीके मूलभूत द्वंद्व इस अर्थव्यवस्थामें भी बने रहते हैं । वे बतलाते हैं कि कैसे मशीनीकरण के विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया में मस्तिष्क, ज्ञान की ताकत, सामान्य सामाजिक ज्ञान प्रत्यक्ष उत्पादक शक्ति बन जाता है, कि उत्पादकता बढ़ने के साथ समग्र रूप से मानवजाति को उपलब्ध खाली समय काफी बढ़ता जाता है, कि कैसे सम्पत्ति “ अतिरिक्त श्रम काल पर नियंत्रण नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति और समूचे समाज के लिए, प्रत्यक्ष उत्पादन में जरूरी काल के अतिरिक्त ( उससे पृथक ) प्रयोज्य काल पर शासन करना ” हो जाता है, कि कैसे अन्वेषण खुद एक व्यवसाय बन जाता है, कि कैसे इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष श्रम सम्पत्ति का विराट स्रोत नहीं रह जाता, कि कैसे इसके साथ ही विनिमय मूल्य पर आधारित उत्पादन का विघटन हो जाता है, आदि, आदि । इस संदर्भ में उनके विचारों को हम पहले ही विस्तार के साथ रख चुके हैं, इसलिए यहाँ उन्हें दुहराने की जरूरत नहीं है । ( देखें ‘ज्ञान की पृष्ठभूमि’ शीर्षक पोस्ट )
प्रस्तुतीकरण की पद्धति और जांच-पड़ताल की पद्धति के बीच फर्क को रेखांकित करते हुए मार्क्स ने खुद लिखा था , दरअसल, प्रस्तुतीकरण की पद्धति को जांच-पड़ताल की पद्धति से निश्चय ही स्वरूप में भिन्न होना चाहिए । जांच-पड़ताल के दौरान सामग्री को विस्तार में ग्रहण करना होता है, विकास के विभिन्न रूपों का विश्लेषण करना पड़ता है, उनके अन्दरूनी सम्बन्धों की खोजबीन करनी पड़ती है । इस कार्य के संपन्न होने के बाद ही वास्तविक गति का यथेष्ट वर्णन किया जा सकता है । यदि यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न कर लिया जाए, दर्पण में प्रतिबिम्बित छवि की तरह यदि विषयवस्तु का जीवन आदर्श रूप में प्रतिबिम्बित हो जाए, तो ऐसा प्रतीत हो सकता है जैसे हमारे सामने महज एक पूर्व-अपेक्षित ( निगमनिक ) रचना ही है।”
ग्रुंड्रिसे में हम जहाँ जांच-पड़ताल की पद्धति का साक्षात करते हैं, वहीं पूंजी में प्रस्तुतीकरण की पद्धति का । ग्रुंड्रिसे में जांच-पड़ताल जहाँ समाप्त होती है, पूंजी का प्रस्तुतीकरण वहीं से आरम्भ होता है ।  

ग्रुड्रिसे ( नोटबुक VII ) के लगभग अन्त में मार्क्स बुर्जुआ सम्पत्ति की पहली श्रेणी के रूप में ‘माल’ की चर्चा करते हैं और पूंजी का पहला अध्याय ‘माल’ से ही शुरू होता है । .... अपनी अन्य रचना थ्योरी ऑफ सरप्लस वैल्यू में वे उन दिनों राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न विचारशाखाओं की आलोचना के क्रम में अपनी अवधारणाओं की विवेचना करते हैं और उन्हें पर्याप्त विस्तार देते हैं ।
जांच-पड़ताल के दौरान, जाहिर है, पूंजी के विकास के विभिन्न विकल्पों का जायजा लिया जाता है, जबकि प्रस्तुतीकरण के दौरान सबसे उपयुक्त ( लगनेवाले ) विकल्प को छोड़कर अन्य विकल्पों को प्रायः नजरअंदाज कर दिया जाता है । मानव मस्तिष्क की भी यही कार्यप्रणाली है । वैसे मार्क्स उपर्युक्त अंशों में वर्णित विश्लेषणों को सार रूप में पूंजी में भी जारी रखते हैं ।


लियोन वालरा, 1834-1910
मार्क्स का उद्देश्य औद्योगिक-पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली की गति-प्रकृति का सर्वांगीण अध्ययन था । ऐसे अध्ययन का मतलब है इस उत्पादन प्रणाली के उद्भव, विकास और अन्त का अध्ययन करना, समग्र सामाजिक संदर्भ में उसकी ऐतिहासिकता का अध्ययन करना । हम पहले देख चुके हैं कि किसी चीज का ज्ञान उस चीज का अतिक्रमण करना है । पूंजी का ज्ञान पूंजी का अतिक्रमण भी है । मार्क्स का समाजवाद पूंजी का यही अतिक्रमण है जिसके बिना पूंजी की ज्ञान-प्रक्रिया पूरी नहीं होती । इस अतिक्रमण के साथ ही शास्त्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र का अंत भी घटित होता है ।
बहरहाल, पूंजी के अतिक्रमण के रूप में विकसित मार्क्स का समाजवाद तब प्रचलित फ्रांसीसी समाजवाद और कम्युनिज्म की समालोचना की प्रक्रिया में अस्तित्व में आया था । मार्क्स के समय प्रचलित फ्रांसीसी समाजवादी तथा कम्युनिस्ट विचारशाखाएँ नैतिक और विभिन्न सतही आधारों पर पूंजी की आलोचना करती थीं । राइनिश जाइटुंग का सम्पादन करने के क्रम में ( 1842-43 में ही ) मार्क्स ने यह महसूस किया था कि इन फ्रांसीसी प्रवृत्तियों की सारवस्तु के बारे में निर्णयात्मक रूप से कुछ कह पाना राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के बिना मुमकिन नहीं था और इसी तरह वे राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हुए । फ्रांसीसी समाजवाद तथा कम्युनिज्म की आलोचना को उन्होंने इस प्रकार राजनीतिक अर्थशास्त्र के अपने अध्ययन के साथ जोड़ दिया । यह उनके समाजवाद का विशिष्ट संदर्भ था ।
मार्क्स ने एक ओर औद्योगिक-पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली को एक प्रगतिशील ऐतिहासिक युग की महिमा प्रदान की, वहीं दूसरी ओर उसकी गति-प्रकृति, उसके अन्दरूनी अन्तरविरोधों के विश्लेषण के जरिए उसके अतिक्रमण के रूप में समाजवादी-साम्यवादी उत्पादन प्रणाली की अवधारणा भी पेश की । ..........


विलियम जेवोंस, 1835-1882
पूंजीवादी प्रणाली के निर्णायक रूप से स्थापित हो जाने के बाद अर्थशास्त्र के लिए इतिहास तथा समाज विज्ञान के सहारे की आवश्यकता समाप्त हो गई – इस उत्पादन प्रणाली को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य तथा वृहत्तर सामाजिक पृष्ठभूमि में अपना औचित्य प्रमाणित करना जरूरी नहीं रह गया । फलतः राजनीतिक अर्थशास्त्र का अवसान घटित हुआ और उसका स्थान सिर्फ अर्थशास्त्र ने ले लिया । अर्थशास्त्र का मुख्य कार्यभार अब पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली की विसंगतियों को, उसमें उत्पन्न असंतुलन को गणितीय सूत्रों तथा समीकरणों के जरिए दुरुस्त करना भर रह गया । इस अर्थशास्त्र का प्रस्थान-बिन्दु हम वालरा के सामान्य प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन की अवधारणा से मान सकते हैं । आगे चलकर, विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के विभिन्न घटकों की गति-प्रकृति के बारीक अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर ऐसे अनेक अमूर्त-आदर्श सूत्र, समीकरण तथा मानदंड विकसित किए जिनके आधार पर यथार्थ अर्थव्यवस्था की जांच-पड़ताल की गई और उसमें उत्पन्न असंतुलन तथा विकृतियों को दूर करने के लिए समग्र अर्थव्यवस्था में विभिन्न घटकों का आदर्श अनुपात एवं विभिन्न कारकों के आदर्श सूचकांक सूत्रबद्ध किए गए । सामान्य काल में समूची अर्थव्यवस्था के संतुलित संचालन के लिहाज से ये सूत्र उपयोगी साबित हुए और आज भी समग्र अर्थव्यवस्था के नियमन में उनकी भूमिका बनी हुई है । अर्थव्यवस्था में आये संकट अथवा असंतुलन के लिए ये अर्थशास्त्री प्रायः इस नियमन में चूक को जिम्मेवार ठहराते हैं । मांग-आपूर्ति, रोजगार, ब्याज दर, मुद्रास्फीति, सकल घरेलू उत्पाद में ऋण का अनुपात, बचत दर, सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय घाटे का अनुपात, सकल घरेलू उत्पाद में विभिन्न क्षेत्रों का अनुपात, शेयर बाजार, पूंजी निवेश में पोर्टफोलियो तथा प्रत्यक्ष निवेश का अनुपात, आयात-निर्यात, भुगतान संतुलन, गरीबी, सब्सिडी, कल्याणकारी कार्यक्रम, आदि – इन सारे विषयों पर मानक सूत्र, सूचकांक तथा अनुपात बने हुए हैं, जिनका कुशल अनुपालन अर्थव्यवस्था के संतुलित संचालन के लिए अपरिहार्य माना जाता है । यहाँ हम इन सूत्रों, सूचकांकों और अनुपातों के विस्तार में नहीं जाएंगे ।

कार्ल मेंगर, 1840-1921
बहरहाल, पहले हमने पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के जिस मीयादी संकट चक्र का जिक्र किया है, उस पर काबू पाने में ये सूत्र, सूचकांक और अनुपात कामयाब नहीं हुए । पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली समय-समय पर तर्कातीत उमंग और संक्रामक निराशा के विनाशकारी झटकों से तबाही मचाती रही, और इस प्रक्रिया में तमाम समीकरणों, सूचकांकों और सूत्रों को उड़ा ले जाती रही ।

19वीं सदी के उत्तरार्ध में ही लियोन वालरा ( स्विट्जरलैंड ) और विलियम जेवोंस ( ब्रिटेन ) के बाद जिन अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक सिद्धान्तों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनमें कार्ल मेंगर, फ्रेडरिख वॉन वाएजर और यूजेन बोहम-बेवर्क ( सभी ऑस्ट्रिया के ) का नाम लिया जाता है – इन लोगों ने अर्थशास्त्र की ऑस्ट्रिया शाखा की नींव रखी । ( यहाँ हम सीमान्त उपयोगिता के प्रचलित सिद्धान्त, इस सिद्धान्त के अनुयायियों में होनेवाले विवादों, अल्फ्रेड मार्शल और पॉल सैमुअलसन, आदि के विचारों के विवरण में नहीं जाएंगे । ) ........
( जारी )

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