ज्ञान अर्थशास्त्र का विकास – 3
प्रसन्न कुमार चौधरी
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| फ्रांसुआ क्वेस्ने, 1694-1774 |
औद्योगिक
उत्पादन प्रणाली के आगमन काल में अर्थशास्त्र की एक शाखा थी जिसे ‘फिजियोक्रैट्स’
के रूप में जाना जाता था । इसके प्रवर्तक थे फ्रांसुआ क्वेसने ( 1694-1774 )
जो लुई पन्द्रहवें तथा मादाम द पोंपादू के चिकित्सक भी थे ।
फिजियोक्रैसी शब्द सुझाया था दुपों द नेमूर ने, जिसका अर्थ है ‘प्रकृति
का नियम’ । पेशे से डॉक्टर क्वेसने बासठ साल की उम्र में
अर्थशास्त्र की ओर प्रवृत्त हुए थे । फिजियोक्रैट्स भूमि को ही सारी सम्पत्ति
का स्रोत मानते थे और भूमि में किए गए श्रम के अलावा शेष सारे श्रम को बिल्कुल
अनुत्पादक या बांझ श्रम की संज्ञा देते थे । उनकी नजर में खेतिहर समुदाय ही
एकमात्र उत्पादक वर्ग था ( मछुआरे तथा खनिक जो प्रकृति से सीधे जलज या खनिज सम्पदा
हस्तगत करते थे, उन्हें भी वे संभवतः उत्पादक श्रेणी में शामिल मानते थे ) । शेष
सारे वर्ग – मैन्युफैक्चरर, मैन्युफैक्चरिंग में काम करनेवाले श्रमिक, व्यापारी,
विभिन्न वृत्तियों में लगे पेशेवर लोग, घरेलू नौकर, सभी अनुत्पादक वर्ग थे जो
एकमात्र उत्पादक कृषक वर्ग द्वारा पैदा की गई सम्पत्ति पर फलते-फूलते थे । कुलीन
तथा पुरोहित वर्ग भूमि से प्राप्त लगान पर ही अपनी विलासितापूर्ण जिन्दगी बिताते
थे । अगर किसान भूमि में अपने श्रम के जरिए अपने उपभोग से अतिरिक्त पैदावार नहीं
उपजाते तो उन वर्गों का वैभव-विलास भी संभव न हो पाता । फिजियोक्रैट्स कारीगरों के
श्रम को भी नौकरों के श्रम से अधिक दर्जा नहीं देते थे, क्योंकि ये कारीगर भी अपने
अस्तित्व के लिए खेतिहरों पर ही निर्भर थे । ( बहरहाल, खेतिहरों की उनकी श्रेणी
में खेतों में खुद श्रम न करनेवाले और सिर्फ देखभाल करनेवाले भूस्वामी तथा उनके
श्रमिक असामी या बटाईदार दोनों शामिल थे – अपने श्रमिक असामियों या बटाईदार पर
निकम्मे भूस्वामियों की सम्पूर्ण निर्भरता को स्वीकार करने से वे साफ बचकर निकल
गये । )
औद्योगिक
उत्पादन प्रणाली के स्थापित होने के साथ ही अर्थशास्त्र की फिजियोक्रैटिक शाखा का
अवसान घटित हुआ । औद्योगिक युग के सभी अर्थशास्त्री उद्योग ( कृषि क्षेत्र भी
क्रमशः उद्योग में परिणत हो गया ) को ही सम्पत्ति का स्रोत तथा औद्योगिक श्रम को
ही उत्पादक श्रम मानते हैं ।
1815
में अपनी एक रचना में रूसी अर्थशास्त्री हैनरिख़ स्टॉर्च ( 1766-1835 ) ने एडम
स्मिथ की अनुत्पादक श्रम की अवधारणा की आलोचना करते हुए यह प्रस्ताव किया था
कि उपभोग भी उत्पादन के लिए जरूरी उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है, इसीलिए
अनुत्पादक वेतनभोगी कर्मचारियों तथा पेशेवर लोगों को भी उतना ही उत्पादक नहीं माना
जाना चाहिए जितना प्रत्यक्ष उत्पादन में लगे श्रमिकों को ? क्या
वेतनभोगी कर्मचारी और पेशेवर लोग अपनी भौतिक जरूरतों की पूर्ति के लिए बाजार मे
नहीं आते, मांगों का सृजन कर भौतिक उत्पादन में अप्रत्यक्ष ढंग से ही सही भागीदार
नहीं बनते ? वे सिर्फ ‘अभौतिक उत्पादों’
का उत्पादन करते हैं, लेकिन वे ‘भौतिक उत्पादों’ का, उत्पादक मजदूरों के उत्पादों का उपभोग करते हैं
। उत्पादक और अनुत्पादक श्रम के बारे में एडम स्मिथ के विचारों से सहमति जताते हुए
कार्ल मार्क्स ने स्टॉर्च की अवधारणा पर जो टिप्पणी की, वह दिलचस्प है और
यहाँ उसका एक संक्षिप्त अंश प्रस्तुत है :
“ स्टॉर्च के अनुसार,
डॉक्टर स्वास्थ्य पैदा करते हैं ( लेकिन बीमारी भी ), प्रोफेसर तथा लेखक प्रबोधन
पैदा करते हैं ( लेकिन पोंगापंथ भी ), कवि, चित्रकार, आदि परिष्कृत अभिरुचि पैदा
करते हैं ( लेकिन अभिरुचि का अभाव भी ), नैतिकतावादी अच्छे तौर-तरीके पैदा करते हैं,
पुरोहित उपासना पैदा करते हैं, शासकों का श्रम सुरक्षा पैदा करता है, आदि ......
इसी तरह हम यह भी कह सकते हैं कि बीमारी डॉक्टर पैदा करती है, मूर्खता प्रोफेसर
तथा लेखक, अभिरुचि का अभाव कवि तथा चित्रकार, अमरता नैतिकतावादियों को पैदा करती
है, अंधविश्वास पुरोहितों को, और आम सुरक्षा संप्रभुओं को । इस तरह की तमाम
कार्यवाहियाँ तथा सेवाएँ यथार्थ अथवा काल्पनिक उपयोग मूल्य पैदा करती हैं, ऐसा
कहकर स्टॉर्च के उत्तराधिकारी यह दिखलाना चाहते हैं कि ये सभी काम करनेवाले एडम
स्मिथ की शब्दावली में उत्पादक मजदूर ही हैं, यानी वे प्रत्यक्ष रूप में तो किसी
उत्पाद का सृजन नहीं करते, लेकिन वे भौतिक श्रम के उत्पादों के उत्पादन में, और इस
प्रकार सम्पत्ति पैदा करने में योगदान देते हैं । ......
दार्शनिक विचारों का
उत्पादन करते हैं, कवि कविताओं का, पादरी उपदेशों का, प्रोफेसर पाठ्यपुस्तकों का,
आदि । एक अपराधी अपराध का उत्पादन करता है । .... एक अपराधी न सिर्फ अपराध का
उत्पादन करता है, बल्कि फौजदारी कानून का भी ; वह उन प्रोफेसरों को भी पैदा करता है जो फौजदारी कानून पर व्याख्यान देते
हैं, और यहाँ तक कि उन अपरिहार्य पाठ्यपुस्तकों का भी जिसमें प्रोफेसर के
व्याख्यान होते हैं और जिन्हें वह बाजार में बिक्री के लिए माल के रूप में
प्रस्तुत करता है । इस पाठ्यपुस्तक की पाण्डुलिपि से लेखक खुद जो सुख प्राप्त करता
है, उससे अलग ( बाजार में उसकी बिक्री के परिणामस्वरूप ) इससे भौतिक सम्पत्ति में
भी वृद्धि होती है । इसके अलावा, अपराधी पुलिस तथा फौजदारी न्याय, जासूस,
न्यायाधीश, तामीलदार, जूरी, और इसी तरह के विभिन्न पेशों को भी जन्म देता है जो
श्रम के सामाजिक विभाजन की कितनी ही श्रेणियों का निर्माण करता है, मानवीय
व्यक्तित्व की विविध क्षमताओं का विकास करता है, नई जरूरतें पैदा करता है और
उन्हें पूरा करने के नये तरीके भी । यातना ने खुद सबसे उम्दा यांत्रिक आविष्कारों
का अवसर प्रदान किया । इन उपकरणों के निर्माण में अनेक ईमानदार मजदूर रोजगार पाते
हैं ।
अपराधी
कभी नैतिक, कभी त्रासद भाव पैदा करता है । वह लोगों में नैतिक तथा
सौन्दर्यशास्त्रीय भाव जागृत कर अपनी ‘सेवा’ प्रदान करता है । वह न सिर्फ फौजदारी कानून पर पाठ्यपुस्तक, बल्कि खुद
फौजदारी कानून पैदा करता है, और इसप्रकार विधायकों को भी। वह कला, साहित्य,
उपन्यास, और नाटकों का भी सृजन करता है – ईडिपस, रिचर्ड III, और मुल्नर का शुल्ड तथा शिलर का रौबर, इसके
जीते-जागते उदाहरण हैं । अपराधी बुर्जुआ जीवन की नीरसता तथा सुरक्षा को भंग कर उसे
जड़ता से बचाता है और बेचैनीभरे तनाव को जन्म देता है, व्यक्तित्व की उस गतिशीलता
को उभारता है जिसके बिना प्रतियोगिता की उत्प्रेरणा ही कुंद हो जाएगी । इस प्रकार
वह उत्पादक शक्तियों को नया आवेग प्रदान करता है । श्रम बाजार से अतिरिक्त आबादी
के एक हिस्से को अपने साथ लेकर अपराध मजदूरों के बीच प्रतिद्वंद्विता को कम करता
है और इस प्रकार कुछ हद तक मजदूरी को न्यूनतम के नीचे गिरने से रोकता है । वहीं अपराध
के खिलाफ युद्ध उसी आबादी के एक दूसरे हिस्से को अपने में समाहित कर लेता है । इस
प्रकार अपराधी ‘एक प्राकृतिक संतुलनकारी शक्ति’ के रूप में उपस्थित होता है, जो एक न्यायपूर्ण संतुलन की स्थापना करता है और ‘उपयोगी’ वृत्तियों के उद्घाटन की सारी
संभावनाएँ प्रस्तुत करता है । उत्पादक शक्तियों के विकास पर अपराधियों के प्रभाव
को विस्तार में भी दिखाया जा सकता है । अगर चोर नहीं होते तो क्या ताला बनानेवालों
का व्यवसाय मौजूदा दक्षता हासिल कर पाता ?
अगर जाली नोट बनानेवाले न होते तो क्या बैंक नोटों के मैन्युफैक्चरर मौजूदा
उत्कर्ष हासिल कर पाते ? जालसाज नहीं होते तो क्या
माइक्रोस्कोप आम व्यावसायिक जीवन में प्रवेश कर पाता ? व्यावहारिक रसायनशास्त्र के विकास में ईमानदार उत्पादक प्रयासों के जितना ही
क्या मिलावटों का, तथा मिलावटों का पता लगाने के प्रयासों का भी योगदान नहीं है ? सम्पत्ति पर प्रहार करने के नये तरीकों के अनवरत् विकास के जरिए अपराध
सुरक्षा के नये उपायों को भी जन्म देता है और इस प्रकार उसका उत्पादक प्रभाव उतना
ही बड़ा है जितना मशीनों के आविष्कार की उत्प्रेरणा के रूप में हड़तालों का ।
निजी
अपराध की दुनिया को छोड़ भी दें, तो क्या राष्ट्रीय अपराधों के बिना विश्व-बाजार
का, खुद राष्ट्रों का अस्तित्व ही हो पाता ?
आदम के जमाने से ही क्या बुराई का वृक्ष ज्ञान का वृक्ष नहीं रहा है ? फेबुल ऑफ दि बीज (1708) में मेंडेविल ने पहले ही तमाम
अंग्रेजी व्यवसायों की उत्पादकता दिखला दी थी, और हमारे तर्कों का पूर्वानुमान कर
लिया था : ‘इस दुनिया में जिसे हम नैतिक और प्राकृतिक बुराई कहते हैं, वह एक महत् नियम है
जो हमें सामाजिक प्राणी बनाता है, जो निरपवाद रूप में तमाम व्यवसायों और रोजगारों
का ठोस आधार, उसका जीवन और सहारा है :
तमाम कलाओं तथा विज्ञान का सच्चा उत्स हमें वहीं मिलेगा, और जिस क्षण बुराई समाप्त
हो जाएगी, उस क्षण समाज भी, अगर पूरी तरह विखंडित नहीं भी हुआ तो बर्बाद जरूर हो
जाएगा ।’
बुर्जुआ समाज के इन
संकीर्णमना समर्थकों की तुलना में मेंडेविल में सहज ही अनन्तगुना निर्भीकता और
ईमानदारी थी । ” (अंग्रेजी में यह उद्धरण इस ब्लॉग पर अन्यत्र उपलब्ध है।
अंग्रेजी से हिन्दी रूपान्तर लेखक द्वारा ।)
[ प्रसंगवश, बर्नार्ड डी मेंडेविल दार्शनिक
अभिरुचियोंवाले एक डॉक्टर थे जिन्होंने 1704 में एक कविता प्रकाशित की थी, जिसे कई
और रचनाएँ शामिल कर 1774 में दि फेबुल ऑफ द बीज ऑर प्राइवेट वाइसेज पब्लिक
बेनिफिट्स ( मधुमक्खियों का गल्प अथवा निजी बुराइयाँ सार्वजनिक लाभ ) शीर्षक
से पुनर्प्रकाशित किया गया । पुस्तक का मूल विचार यह था कि सभ्यता ( जिससे
तात्पर्य सिर्फ धन नहीं, बल्कि तमाम कलाएँ और विज्ञान भी था ) मानवजाति की
अच्छाइयों का परिणाम नहीं, बल्कि उसकी बुराइयों का परिणाम है । दूसरे शब्दों में,
खुशहाली, सुविधा, विलासिता और जीवन के तमाम सुखों की इच्छा हमारी प्राकृतिक
जरूरतों से जन्म लेती हैं । पुस्तक एक प्रकार से ‘अच्छे’
लोगों की आलोचना और प्राकृतिक मनुष्य का पक्षपोषण करती थी । उन दिनों इस किताब ने ‘भद्र
जनों’ के समाज में खलबली मचा दी थी, और सरकार के आदेश
से इसे जब्त कर लिया गया था । अपनी पुस्तक थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेण्ट्स में
एडम स्मिथ ने मेंडेविल की आलोचना की और अभिरुचियों तथा इच्छाओं को बुराइयों
के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उन्हें काफी खरी-खोटी भी सुनाई । स्मिथ के
अनुसार, ये अभिरुचियाँ और इच्छाएँ अपने आप में बुराइयाँ नहीं हैं । स्मिथ ने अपने
इस विश्वास को पुनः दुहराया कि निजी स्वार्थ ( जो उनकी नजर में कोई बुराई नहीं,
बल्कि एक निम्न कोटि की अच्छाई है ) न चाहते हुए भी समाज को खुशहाली और समृद्धि के
रास्ते पर ले जाता है । ]
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| बर्नार्ड डी मेंडेविल, 1670-1733 |
इस
दिलचस्प विषयांतर के बाद हम वापस उत्पादक और अनुत्पादक श्रम के अपने विषय पर लौटते
हैं । अठारहवीं, उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के भी अधिकांश काल में औद्योगिक
उत्पादन-प्रणाली के आधार पर उत्पादक और अनुत्पादक श्रम का विभाजन करना एक बात है,
आज की ज्ञान अर्थव्यवस्था के काल में वही विभाजन करना बिल्कुल दूसरी बात । आज भी
प्रचलित अर्थशास्त्रीय अध्ययनों में औद्योगिक श्रम को ही उत्पादक श्रम मानने की
प्रवृत्ति हावी है और ज्ञान क्षेत्र के श्रम को प्रायः अनुत्पादक या अनुपूरक श्रम
की श्रेणी में डाल दिया जाता है । हमारी समझ से यह नव-फिजियोक्रैटिक प्रवृत्ति है
।
उत्पादक
श्रम के बारे में औद्योगिक समाज की अवधारणा इतनी घर कर चुकी है कि बाध्यतामूलक
श्रम-काल से पृथक फाजिल समय को अनुत्पादक समय मान लिया जाता है, जबकि मनुष्य का
वही सबसे उत्पादक काल होता है । इसकी पर्याप्त चर्चा हम पहले कर चुके हैं ।
बाध्यतामूलक श्रम में नियुक्त हर मजदूर और कर्मचारी हर समय अपने खाली समय का
विस्तार करना चाहता है, कार्यस्थल पर भी अपने कथित श्रम-काल से कुछ समय चुराकर उसे
अपने खाली समय का हिस्सा बना लेना चाहता है और इस प्रयास में उसे समय-समय पर
अनुशासनात्मक कार्रवाइयों तथा दण्डों का भी सामना करना पड़ता है, और अपने मन से
किये जानेवाले किसी उत्पादक क्रियाकलाप अथवा स्वाधीन कार्यसक्रियता के जरिए समुचित
आय का अवसर उपलब्ध होने पर नौकरी भी छोड़ देता है । ..यही बात इंजीनियरों,
तकनीशियनों, लेखकों-पत्रकारों, और अन्य पेशेवर लोगों पर भी लागू होती है ।
ज्ञान-उत्पादों ने उन्हें अपने मुक्त समय का उपयोग करने की खातिर उपकरण प्रदान
किया है ।
कुलमिलाकर,
औद्योगिक उत्पादन प्रणाली पर आधारित दृष्टि हमें ज्ञान समाज की समझ हासिल करने से
वंचित कर देती है । यह वंचना हमें मस्तिष्क-उत्पादों का निष्क्रिय उपभोक्ता
बनाने का आधार प्रदान करती है ।
ज्ञान
युग में इतिहास का मुख्य क्रियास्थल मस्तिष्क है, इसीलिए औद्योगिक समाज के
गणितीय-सांख्यिकी अर्थशास्त्र का अवमूल्यन घटित हुआ है, हालांकि सीमित रूप में
उसकी उपयोगिता बनी हुई है । मस्तिष्क का दायरा अन्तहीन है, इसीलिए ‘मनोवैज्ञानिक’
और ‘तंत्रिका’
अर्थशास्त्र की सीमाओं में भी इसे नहीं बांधा जा सकता । ज्ञान अर्थशास्त्र एक
ओर ऐतिहासिक शास्त्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र को नये स्वरूप में नवजीवन प्रदान कर
रहा है, वहीं दूसरी ओर संस्कृति के अनन्त आकाश में अपने अर्थ का सतत् संधान भी कर
रहा है । अर्थ का ‘अर्थ’ से मिलन घटित हो रहा है । सांस्कृतिक अर्थशास्त्र के रूप में ज्ञान का
अर्थशास्त्र अभी भी अपनी शैशवावस्था में ही है ।
(
सभी पोस्ट्स से सम्बन्धित टिप्पणियों तथा संदर्भ-सामग्रियों का यहाँ उल्लेख नहीं
किया गया है । मेरी पुस्तक अतिक्रमण की अन्तर्यात्रा : ज्ञान की समीक्षा का एक प्रयास के कुछेक अंशों की यह श्रृंखला फिलहाल स्थगित की जाती है । )
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